पैर छूना सिर्फ कसरत या समर्पण नहीं है ...इसका बहुत वैज्ञानिक आधार है! मानव के पैरों के तलवे में सूक्ष्म रूप से शरीर के सभी अंग विद्यमान होते हैं, जब विनम्रता और श्रद्धा से किसी के पैर छुए जाते हैं, तो जिसके पैर छुआने वाले व्यक्ति के सभी अंगों में तरंगीय प्रभाव होता है तो पैरों से सीधे मस्तिष्क तक पहुँचता हैं और वो भाव -विभोर हो जाता है ! इस प्रकार अपने मन के शुद्ध भावों को संप्रेषित करने का ये एक सशक्त माध्यम है ! ऐसे ही मानव के हाथों की हथेलियों में भी सूक्ष्म रूप से शरीर के सभी अंग होते है, तब आशीर्वाद स्वरूप जिन हाथों को सर पे रखा जाता है उनसे भी पवित्र भाव-तरंगे निकलती है!
मेरी अभिव्यक्तियाँ ..
Monday, 2 April 2012
Sunday, 1 April 2012
उड़ने दो मन की चिड़िया को ...
उड़ने दो मन की चिड़िया को ...
पंखों में भार नहीं है
मन पे कुछ उधार नहीं है
विचलित होने में सार नहीं है
दूर क्षितिज को छू आओ
आसमान से तारे चुन लाओ
छोटे छोटे पंखों पर बड़े बड़े सपने
एक चिड़िया उडी है, ढूँढने कुछ अपने....
सूरज अपने ताप से,
आसमान अपने नाप से,
हवाएं अपने वेग से
शीतल जल अपने मेघ से
डराते हैं इस नन्ही चिड़िया को
फिर भी उड़ने दो मन की चिड़िया को ....
चहचहाती ये ...एक डाल पर ..
राह तकती अपने प्रियतम की ..
उष्ण दोपहरी, अब थकी साँझ
गति मंथर, दशा प्रत्यंतर
नेत्र खुले, मनमीत मिले
पंख फैला लो,
पा लो विस्तार जीवन का,
ले लो सत्कार अपने प्रियतम का
उड़ने दो मन की चिड़िया को .....
पंखों में भार नहीं है
मन पे कुछ उधार नहीं है
विचलित होने में सार नहीं है
दूर क्षितिज को छू आओ
आसमान से तारे चुन लाओ
छोटे छोटे पंखों पर बड़े बड़े सपने
एक चिड़िया उडी है, ढूँढने कुछ अपने....
सूरज अपने ताप से,
आसमान अपने नाप से,
हवाएं अपने वेग से
शीतल जल अपने मेघ से
डराते हैं इस नन्ही चिड़िया को
फिर भी उड़ने दो मन की चिड़िया को ....
चहचहाती ये ...एक डाल पर ..
राह तकती अपने प्रियतम की ..
उष्ण दोपहरी, अब थकी साँझ
गति मंथर, दशा प्रत्यंतर
नेत्र खुले, मनमीत मिले
पंख फैला लो,
पा लो विस्तार जीवन का,
ले लो सत्कार अपने प्रियतम का
उड़ने दो मन की चिड़िया को .....
Sunday, 4 March 2012
वो सत्कार कैसे स्वीकार करूँ .......
ये बात वर्ष 1994 -95 की है जब मेरा पदस्थापन सिंचाई विभाग में था ..मुख्य अभियंता महोदय ने मुझे एक दिन अपने कक्ष में बुला कर विभाग की गोपनीय शाखा की एक रिपोर्ट तैयार करके सौंपने के लिए मुझे निर्देश दिए! मैंने ये सुन रखा था की उस शाखा के प्रभारी श्री नानगराम जी बहुत गुस्सैल बुजुर्ग , किन्तु कार्य में दक्ष और बेहद इमानदार हैं! जब मैंने उस शाखा को जानने के लिए वहां बैठना शुरू किया तो बहुत सी बाते देखी जैसे उस शाखा कुल ३ लोग पदस्थापित थे और किसी भी कागज का निस्तारण जब तक नहीं हो जाता था उस काम की चुरम सी लगी रहती थी ...! नानगराम जी अपनी जंग लगी हुई टूटे पैडिल की साईकिल से कोई १० किलोमीटर चलकर आते और सुबह ठीक १० बजे शाखा कमरा खुल जाता था, उसके बाद उसमे से शाम पांच बजे तक लोग सिर्फ सरकारी काम से ही बहार निकलते थे ! आधे आधे इंच बढ़ी हुई बेतरतीब सी खिचड़ी दाढ़ी, मुह में बीडी, बिखरे से बाल, जेब में एक टूटा हुआ नारंगी रंग का बालपैन .. घिसे हुए वस्त्र साथ में पैरों की उंगलियाँ को हवा देते हुए छेद हुए जूते .....ये हुलिया था नानगराम जी का!
जब मै सुबह सुबह उस कमरे में घुसता तो बड़े आदर सहित मुस्कुराकर वहाँ मेरा स्वागत किया जाता उसके बाद मेरे आगे एक पानी का जग (जो शायद सम्पूर्ण कार्यालय में सबसे साफ़ जग था) रख कर वहाँ मेरी मौजूदगी को भुला दिया जाता और लोग आने काम में जुटे रहते थे !
धीरे धीर मैंने उस शाखा में कुछ सुझाव दिए और उनके साथ घुलना मिलना शुरू किया .. पता नही क्यों लेकिन शायद उम्र में एक बहुत बड़े अंतर और कठोर स्वाभाव के साम्य के कारण मै नानगराम जी में अपना पिता सा व्यक्तित्व खोजने लगा शायद वो मुझसे ३० वर्ष बड़े थे ! समय बीतने लगा मैं वहाँ अपने स्वाभाव के मुताबिक हंसी ठिठोली करने लगा ... और धीरे धीरे कुछ ऐसा स्नेह मुझे उनसे होने लगा की मैंने अपना उनसे बेहतर सुविधों युक्त कमरा छोड़ दिया और उनके साथ उसी कमरे में अधिकांश समय व्यतीत करने लगा ...दिन में एक बार कमरे के अन्दर ही एक हीटर पर चाय बनाई जाती थी ...और बाकि समय सिर्फ काम !
कोई छः माह बीत गए और तब तक मैंने अपनी रिपोर्ट भी मुख्य अभियंता को सौप दी लेकिन मैं उस शाखा का होकर रह गया .. रोज कुछ न कुछ नया अनुभव सीखता रोज उस इंसान की काबिलियत और ईमानदारी से अभिभूत होता ..! कोई दो बरस बाद एक दिन मुझे ख़याल आया की नानग राम जी जिनके कमरे मै अब स्थाई रूप से बैठने लगा हूँ वो आज दिन तक मेरे कक्ष में आये ही नही है ...! तो एक दिन सुबह सुबह मैंने उनसे ये बात कह दी कि भाई साहब कल से मै आपकी इस शाखा में नही बैठूँगा ... नानग राम जी जो तब तक मुझे अपने मानस पुत्र की तरह स्नेह देने लगे थे .. सुन कर बोले .. "क्यों बेटा ? ऐसी क्या बात हो गई ?" तो मैंने उन्हें कभी मेरे कक्ष में ना आने शिकायत कह दी ..! मेरी बात सुन कर वो थोडा गंभीर हो गए ...!
जैसे किसी खालीपन को भरने के लिए वो कुछ शब्द खोजते हों ..फिर उन्होंने चित परिचित अंदाज में एक बीडी सुलगाई और मेरी आँखों में देखा ..और कहा .."बेटा जब तुम मेरे कमरे में आकर बैठते हो तो मै तुम्हारा स्वागत इस पानी के जग से करता हूँ और .. बस दोपहर को एक चाय वो भी यहीं इस कमरे में बना कर ..! जो मै तुम्हारे कमरे में आया तो तुम हो सकता है अपनी हैसियत अनुसार में सत्कार करो जैसे उसी समय एक कोफ़ी का आर्डर करो साथ में कुछ नाश्ता और मेरी इस चार आने की बीडी की जगह मुझे दो रुपये की सिगरेट ऑफ़र करो" ..... बीडी का एक और कश खींचकर उन्होंने अपनी आंख को जरा सिकोडा और आगे जो कुछ कहा वो मेरे मानस में आज यूँ का यूँ अंकित है ... "बेटा मेरा स्वाभिमान मुझसे ये कहता है कि जो सत्कार आप किसी का कर नही सकते उसे स्वीकारने का भी अधिकार आपको नही है .. यदि आपने उसे स्वीकार कर लिया तो बहुत शीघ्र आप अपनी इज्जत खो बैठेंगे .."
उनका कथन सुन कर मेरी उनके प्रति मेरी श्रद्धा कि सीमा ना रही .. यूँ लगा कि अब क्या कहूँ ... मै सिर्फ उठा और उनके पैर छू लिए ... वो मेरे लिए सरकारी नौकरी के पहले गुरु साबित हुए .. वर्ष 1998 में वो शख्स आदरसहित सेवानिवृत होकर अब घर में आराम कर रहे है . मेरा भी सिंचाई विभाग से कोई ११ वर्ष पहले स्थानांतरण हो चूका है मै अब भी जाता हूँ उनसे मिलने .. उनके चरण छूने ..और उनका वही अंदाज कायम है ... उनके गाँव जाते ही एक पानी का जग सामने साथ में बीडी बण्डल और माचिस (जो मै नही पीता फिर भी ) मेरे आगे रख दिया जाता है ..फिर थोड़ी देर में एक सफ़ेद से पुराने कप में एक अदबुध स्नेह भरी चाय ...
'जो सत्कार मै किसी का कर नही सकता वो मै अब कभी स्वीकार भी नही करता .... ' जाने कहाँ गए वो लोग जो ऐसा सोचते थे . मेरा उन्हें कोटि कोटि नमन !

जब मै सुबह सुबह उस कमरे में घुसता तो बड़े आदर सहित मुस्कुराकर वहाँ मेरा स्वागत किया जाता उसके बाद मेरे आगे एक पानी का जग (जो शायद सम्पूर्ण कार्यालय में सबसे साफ़ जग था) रख कर वहाँ मेरी मौजूदगी को भुला दिया जाता और लोग आने काम में जुटे रहते थे !
धीरे धीर मैंने उस शाखा में कुछ सुझाव दिए और उनके साथ घुलना मिलना शुरू किया .. पता नही क्यों लेकिन शायद उम्र में एक बहुत बड़े अंतर और कठोर स्वाभाव के साम्य के कारण मै नानगराम जी में अपना पिता सा व्यक्तित्व खोजने लगा शायद वो मुझसे ३० वर्ष बड़े थे ! समय बीतने लगा मैं वहाँ अपने स्वाभाव के मुताबिक हंसी ठिठोली करने लगा ... और धीरे धीरे कुछ ऐसा स्नेह मुझे उनसे होने लगा की मैंने अपना उनसे बेहतर सुविधों युक्त कमरा छोड़ दिया और उनके साथ उसी कमरे में अधिकांश समय व्यतीत करने लगा ...दिन में एक बार कमरे के अन्दर ही एक हीटर पर चाय बनाई जाती थी ...और बाकि समय सिर्फ काम !
कोई छः माह बीत गए और तब तक मैंने अपनी रिपोर्ट भी मुख्य अभियंता को सौप दी लेकिन मैं उस शाखा का होकर रह गया .. रोज कुछ न कुछ नया अनुभव सीखता रोज उस इंसान की काबिलियत और ईमानदारी से अभिभूत होता ..! कोई दो बरस बाद एक दिन मुझे ख़याल आया की नानग राम जी जिनके कमरे मै अब स्थाई रूप से बैठने लगा हूँ वो आज दिन तक मेरे कक्ष में आये ही नही है ...! तो एक दिन सुबह सुबह मैंने उनसे ये बात कह दी कि भाई साहब कल से मै आपकी इस शाखा में नही बैठूँगा ... नानग राम जी जो तब तक मुझे अपने मानस पुत्र की तरह स्नेह देने लगे थे .. सुन कर बोले .. "क्यों बेटा ? ऐसी क्या बात हो गई ?" तो मैंने उन्हें कभी मेरे कक्ष में ना आने शिकायत कह दी ..! मेरी बात सुन कर वो थोडा गंभीर हो गए ...!
जैसे किसी खालीपन को भरने के लिए वो कुछ शब्द खोजते हों ..फिर उन्होंने चित परिचित अंदाज में एक बीडी सुलगाई और मेरी आँखों में देखा ..और कहा .."बेटा जब तुम मेरे कमरे में आकर बैठते हो तो मै तुम्हारा स्वागत इस पानी के जग से करता हूँ और .. बस दोपहर को एक चाय वो भी यहीं इस कमरे में बना कर ..! जो मै तुम्हारे कमरे में आया तो तुम हो सकता है अपनी हैसियत अनुसार में सत्कार करो जैसे उसी समय एक कोफ़ी का आर्डर करो साथ में कुछ नाश्ता और मेरी इस चार आने की बीडी की जगह मुझे दो रुपये की सिगरेट ऑफ़र करो" ..... बीडी का एक और कश खींचकर उन्होंने अपनी आंख को जरा सिकोडा और आगे जो कुछ कहा वो मेरे मानस में आज यूँ का यूँ अंकित है ... "बेटा मेरा स्वाभिमान मुझसे ये कहता है कि जो सत्कार आप किसी का कर नही सकते उसे स्वीकारने का भी अधिकार आपको नही है .. यदि आपने उसे स्वीकार कर लिया तो बहुत शीघ्र आप अपनी इज्जत खो बैठेंगे .."
उनका कथन सुन कर मेरी उनके प्रति मेरी श्रद्धा कि सीमा ना रही .. यूँ लगा कि अब क्या कहूँ ... मै सिर्फ उठा और उनके पैर छू लिए ... वो मेरे लिए सरकारी नौकरी के पहले गुरु साबित हुए .. वर्ष 1998 में वो शख्स आदरसहित सेवानिवृत होकर अब घर में आराम कर रहे है . मेरा भी सिंचाई विभाग से कोई ११ वर्ष पहले स्थानांतरण हो चूका है मै अब भी जाता हूँ उनसे मिलने .. उनके चरण छूने ..और उनका वही अंदाज कायम है ... उनके गाँव जाते ही एक पानी का जग सामने साथ में बीडी बण्डल और माचिस (जो मै नही पीता फिर भी ) मेरे आगे रख दिया जाता है ..फिर थोड़ी देर में एक सफ़ेद से पुराने कप में एक अदबुध स्नेह भरी चाय ...
'जो सत्कार मै किसी का कर नही सकता वो मै अब कभी स्वीकार भी नही करता .... ' जाने कहाँ गए वो लोग जो ऐसा सोचते थे . मेरा उन्हें कोटि कोटि नमन !

पापा आप मुझ से बहुत कुछ कहते थे ....बहुत सिखाते थे !
मेरे पूज्यनीय पिताश्री स्वर्गीय महेंद्र जी पारीक (17 दिसम्बर 1943 - 2 अगस्त 1991 ) की पावन स्मृति में
========================================================================
पापा आप तो हमेशा बहुत कुछ कहते थे बस मैं ही अब समझा हूँ लगता है जैसे ट्रेन निकल चुकी है और मैं अब भी स्टेशन के आधे रास्ते ही पहुंचा हूँ ....शायद आप सही कहते थे समझ बुढ़ापे में आती है और कमबख्त ये बुढ़ापा जवानी के बाद ! आज सहसा आपकी कही हर बात बहुत याद आती है ... मैं बचपन में बस आपका लाड तलाशता रहा और अब खुद को तलाशता हूँ ।
मुझे याद है 1975 में किस तरह आपने एक प्रतिष्ठित विद्यालय में मेरे दाखिले को अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बनाया था, आपके पत्रकार मित्रो ने कैसे रात और दिन सिर्फ मेरे खातिर एक सपना सा बुना था जैसे सभी मुझमे अपना पुत्र खोजते थे . । मैं भूला नही हूँ अभी तक की कैसे मेरी खुशियों के लिए आप दो-दो नौकरियां किया करते थे . रात और दिन सिर्फ मैं और मेरा भविष्य आपकी आँखों में तैरता था .. मैं बस आपसे लाड चाहता थे जो अक्सर आप मुझे नहीं देते थे । आज मेरे स्मरण में आता है कि किस तरह रात 3 बजे "पत्रिका" का सम्पादकीय पेज बना कर आते थे, थके मांदे .. और अचानक सुबह 6 बजे माँ आपको यह कह कर उठा देती थी कि आज मेरा स्कूल टेम्पो नहीं आया है और आप बिना मुझ से कुछ कहें अपनी मोपेड पर मुहे बिठा कर छोड़ने निकल पड़ते थे ..।
पापा, मुझे तो सिर्फ आपसे वो लाड चाहिए था जिसकी तलाश में मैं छ दिन आपका इन्तजार किया करता था कि आज इतवार है आपसे मुलाकात होगी ... आप तो रोज ही मेरे स्कूल जाने के बाद उठते थे और मेरे सोने के बाद घर आते थे .. अब पता लगता है वो हाड-तोड़ मेहनत आप सिर्फ मेरे ही लिए किया करते थे ... मुझे इंसान बनाने के लिए .। मुझे ये भी याद है हर रविवार आपके उठते ही मैं आपके सामने जाकर बैठ जाया करता था ..आप अक्सर मेरी मौजूदगी को अनदेखा करते थे और अपना सारा लाड मेरे चचेरे भाई बहनों को लुटाया करते थे । वो आपका मेरे उन भाई बहनों से अखबार की विभिन्न ख़बरें पढवाना मुझे बहुत अखरता था .. मैं तो कब से आपके उठने से पहले ही कुछ ख़बरों को पढ़ कर शुद्द उच्चारण का रियाज किया करता था .... आपको अपना सर्वोत्कृष्ट दिखा सकूँ ...मैं कितना सोचता था तब ..सिर्फ आपका लाड पाने के लिए ..जब आप मुझे अपने पास नहीं बुलाते थे तो मुझे बहुत बुरा लगता था . तनाव होता था .. मैं आपके सामने बैठ कर उंगलिया मोड़ता .. अजीबो गरीब हरकतें करता .. तब आप मुझे असामान्य देखते और मुझे लताड़ देते ..मेरे साथ मेरी माँ को भी क्योंकि अक्सर वही मुझे बिगाड़ने की तोहमत झेलती थी ..। पापा मैं तो सिर्फ आपका लाड चाहता था .. किसी दिन आपके बाजु पे आपसे चिपक कर उस खुशबु को सूंघना चाहता था .. जो आपके पसीने में मुझे आती थी ।
पापा मुझे सब याद है वो आपका मुझे डांट-डांट कर मेरे जूतों पे पालिश करना सिखाना, वो पालिश का ब्रुश पकड़ना सिखाना, वो कपड़ों पे प्रेस से सही क्रीज करना सिखाना, खाना खाते समय पांचों उँगलियों से पकड़ कर खाना सिखाना, खाते समय मुह से आवाज आने पर डांटना , और चलते समय पैर घिसने पर लताड़ना , वो हाथ के इशारों के साथ बात करने पर अपनी डांट से बुरी तरह झकझोर देना, अपनी चीजें यथा स्थान रखने के की आदत डलवाना, नहाने के बाद बाथरूम को साफ कर बहार आने की हिदायतें , सभी कुछ मेरे आज आज बहुत काम आता है , मैं स्वयं को भीड़ से अलग खड़ा पाता हूँ , बस अकेला अब अकेला हूँ आप बहुत याद आते हो ।
पापा, मैं कितनी कोशिश करता था पढाई में अव्वल , स्कूल के अन्य सभी गतिविधियों में अव्वल, सहपाठी, गुरुजन सभी तारीफ करते थे .. बस नहीं सुन पाता था तो आपके मुह से वो एक शब्द "शाबास बेटा" .. मैं बस आपका लाड पाना चाहता था और वही नहीं पाता था ...। आप "शाबास" के आलावा कितना कुछ कहते थे .. सब एक उपदेश सा लगता था , आप कहते थे जीवन एक रिले रेस है जिसमे बैटन को लेकर दौड़ना होता है और अपना चक्कर पूरा करके बैटन को अगले को थमाना होता है . मुझे नहीं पता था आप अपना चक्कर इतना जल्दी पूरा कर लेंगे ... मैं तो आपसे मिली बैटन लेकर अब तक दौड़ रहा हूँ और ये चक्कर है कि पूरा होता दीखता ही नहीं ..। आप अक्सर अपने हाथों की उँगलियों को पिरामिड की तरह जोड़ कर समझाते थे .. दुनिया/जीवन ऐसा होता है ..नीचे आधार चौड़ा ओर बहुत भीड़ भरा होता है .. जैसे जैसे ऊंचाई छूते है वैसे वैसे भीड़ छंटती जाती है .. शिखर पे (पिरामिड के) कोई एक खड़ा होता वहां पैर रखने की जगह जो कम होती है ...। मैं कुछ नही समझ पाता था आपकी ये बड़ी बड़ी बातें ..मैं तो सिर्फ आपका लाड पाना चाहता था ..।
मुझे भली प्रकार याद है जब मै ग्यारवीं में आया .. विषय चुनना था , आपने सिर्फ इतना भर कहा "चुन लो जिसमे तुम अपना सर्वश्रेष्ठ दे सको .. मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की जीवन में तुम क्या कार्य करोगे .फर्क पड़ेगा तो सिर्फ तब जब तुम उसमे अपना सर्वश्रेष्ठ ना दे पाए .. तुम सड़क पे झाड़ू लगाओ लेकिन वो ऐसी लगाओ की लोग ये कह उठें .. की इससे बेहतर झाड़ू कोई लगा ही नहीं सकता.." पापा मैं तो तब भी नहीं समझा कि आप मुझे कितना प्यार करते थे .. अच्छे अंकों से स्कूल पास करके भी मैं आपसे वो नहीं सुन सका जिसके लिए मेरे कान तरसते थे - "शाबास नगेन्द्र" । मैंने कालेज में राज्य ओर राष्ट्रीय स्तर की कितनी ही वाद विवाद प्रतियोगिताये जीती ..छात्र संघ के चुनाव भी जीते ..नहीं जीत सका तो आपके वही दो शब्द ..मैं कितना पुलकित होता था मन में जब बहुत से सांसद, एम्.एल.ए. मंत्री सुबह सुबह घर आकर आपकी चिरौरी किया करते थे ।
वर्ष 1990 में आप बीमार हुए, डाक्टर के अनुसार आपको कैंसर था ..आप वैसे ही मुस्कुरा रहे थे जैसे कुछ हुआ ही ना हो .. फिर पैसे के आभाव में वो इलाज शुरू करने का इन्तजार .. ओर खुद्दारी में किसी से मदद ना लेना . कितनी जिद्द , मुझे याद है आपके साथ वो मुंबई में कटा एक साल प्रतिदिन आपको दलिया बना कर खिलाता था .. तब अकेला था तो सोचता था पूछूँ कि आपने कभी क्यों नहीं कभी कहा कि आप भी मुझे प्यार करते हैं .. बस नहीं पुछा .. तब भी आप वैसी ही बातें किया करते थे .. बड़ी बड़ी ..और मैं बस सुनता था ..। मुझे याद है अप्रेल 1991 , कफ परेड , वर्ड-ट्रेड सेण्टर के सामने खड़े होकर मेरे कंधे पे हाथ रख कर आपका मुझसे वो वादा लेना .. कि मैं मेरी माँ का बहुत ध्यान रखूँगा ..पापा मैं आज बीस वर्ष बाद भी अपने उस वादे पे कायम हूँ .. आप कहते थे जीवन में एक पीढ़ी शत-प्रतिशत को लक्ष्य बना कर शुन्य से शुरू करती है ओर लगभग 40 -50 तक पहुँच पाती है, उससे अगली पीढ़ी कि गिनती उसके आगे से शुरू होती है और संघर्ष अक्सर 0 -40 का होता है .. उसके आगे जीवन ठहर कर आराम से आगे बढ़ता जाता है ओर सौ तक का सफ़र आसन होता जाता है .. पापा मैं तब नहीं समझा था .. पर आज जाना हूँ .. आपकी नीव पर मैं वो ईमारत बना रहा हूँ बिना किसी जोर के ..और अब समझा हूँ आप कितना प्यार करते थे मुझे ।
सावन माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी , आज के दिन 1991 में आपने जो बैटन मुझे पकड़ाई थी मैं उसे लेकर बदहवास सा दौड़ा चला जाता हूँ इस दुनिया की भीड़ में .. कोई राह नही मिलती . ये दौड़ ख़त्म नहीं होती , माँ आपको अब भी बहुत याद करती है आप बहुत कुछ कहते थे , सच ही कहते थे .. मै तो आज भी कहता हूँ . .. मुझे सब कुछ मिला लाड के सिवा ...।
मुझे याद है, सब याद है पापा, मैं कुछ नही भूला जो जो आप कहा करते थे, सिर्फ उसे विस्तारित कर कर के अब समझ रहा हूँ ...आप नहीं हो लेकिन आपकी कही वो सब बातें अब मै आपके पोत्र से से कहता हूँ ..इसे वो बैटन जो आपने मुझे थमाई थी पकड़ने के काबिल बनाने की कोशिश करता हूँ ।

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पापा आप तो हमेशा बहुत कुछ कहते थे बस मैं ही अब समझा हूँ लगता है जैसे ट्रेन निकल चुकी है और मैं अब भी स्टेशन के आधे रास्ते ही पहुंचा हूँ ....शायद आप सही कहते थे समझ बुढ़ापे में आती है और कमबख्त ये बुढ़ापा जवानी के बाद ! आज सहसा आपकी कही हर बात बहुत याद आती है ... मैं बचपन में बस आपका लाड तलाशता रहा और अब खुद को तलाशता हूँ ।
मुझे याद है 1975 में किस तरह आपने एक प्रतिष्ठित विद्यालय में मेरे दाखिले को अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बनाया था, आपके पत्रकार मित्रो ने कैसे रात और दिन सिर्फ मेरे खातिर एक सपना सा बुना था जैसे सभी मुझमे अपना पुत्र खोजते थे . । मैं भूला नही हूँ अभी तक की कैसे मेरी खुशियों के लिए आप दो-दो नौकरियां किया करते थे . रात और दिन सिर्फ मैं और मेरा भविष्य आपकी आँखों में तैरता था .. मैं बस आपसे लाड चाहता थे जो अक्सर आप मुझे नहीं देते थे । आज मेरे स्मरण में आता है कि किस तरह रात 3 बजे "पत्रिका" का सम्पादकीय पेज बना कर आते थे, थके मांदे .. और अचानक सुबह 6 बजे माँ आपको यह कह कर उठा देती थी कि आज मेरा स्कूल टेम्पो नहीं आया है और आप बिना मुझ से कुछ कहें अपनी मोपेड पर मुहे बिठा कर छोड़ने निकल पड़ते थे ..।
पापा, मुझे तो सिर्फ आपसे वो लाड चाहिए था जिसकी तलाश में मैं छ दिन आपका इन्तजार किया करता था कि आज इतवार है आपसे मुलाकात होगी ... आप तो रोज ही मेरे स्कूल जाने के बाद उठते थे और मेरे सोने के बाद घर आते थे .. अब पता लगता है वो हाड-तोड़ मेहनत आप सिर्फ मेरे ही लिए किया करते थे ... मुझे इंसान बनाने के लिए .। मुझे ये भी याद है हर रविवार आपके उठते ही मैं आपके सामने जाकर बैठ जाया करता था ..आप अक्सर मेरी मौजूदगी को अनदेखा करते थे और अपना सारा लाड मेरे चचेरे भाई बहनों को लुटाया करते थे । वो आपका मेरे उन भाई बहनों से अखबार की विभिन्न ख़बरें पढवाना मुझे बहुत अखरता था .. मैं तो कब से आपके उठने से पहले ही कुछ ख़बरों को पढ़ कर शुद्द उच्चारण का रियाज किया करता था .... आपको अपना सर्वोत्कृष्ट दिखा सकूँ ...मैं कितना सोचता था तब ..सिर्फ आपका लाड पाने के लिए ..जब आप मुझे अपने पास नहीं बुलाते थे तो मुझे बहुत बुरा लगता था . तनाव होता था .. मैं आपके सामने बैठ कर उंगलिया मोड़ता .. अजीबो गरीब हरकतें करता .. तब आप मुझे असामान्य देखते और मुझे लताड़ देते ..मेरे साथ मेरी माँ को भी क्योंकि अक्सर वही मुझे बिगाड़ने की तोहमत झेलती थी ..। पापा मैं तो सिर्फ आपका लाड चाहता था .. किसी दिन आपके बाजु पे आपसे चिपक कर उस खुशबु को सूंघना चाहता था .. जो आपके पसीने में मुझे आती थी ।
पापा मुझे सब याद है वो आपका मुझे डांट-डांट कर मेरे जूतों पे पालिश करना सिखाना, वो पालिश का ब्रुश पकड़ना सिखाना, वो कपड़ों पे प्रेस से सही क्रीज करना सिखाना, खाना खाते समय पांचों उँगलियों से पकड़ कर खाना सिखाना, खाते समय मुह से आवाज आने पर डांटना , और चलते समय पैर घिसने पर लताड़ना , वो हाथ के इशारों के साथ बात करने पर अपनी डांट से बुरी तरह झकझोर देना, अपनी चीजें यथा स्थान रखने के की आदत डलवाना, नहाने के बाद बाथरूम को साफ कर बहार आने की हिदायतें , सभी कुछ मेरे आज आज बहुत काम आता है , मैं स्वयं को भीड़ से अलग खड़ा पाता हूँ , बस अकेला अब अकेला हूँ आप बहुत याद आते हो ।
पापा, मैं कितनी कोशिश करता था पढाई में अव्वल , स्कूल के अन्य सभी गतिविधियों में अव्वल, सहपाठी, गुरुजन सभी तारीफ करते थे .. बस नहीं सुन पाता था तो आपके मुह से वो एक शब्द "शाबास बेटा" .. मैं बस आपका लाड पाना चाहता था और वही नहीं पाता था ...। आप "शाबास" के आलावा कितना कुछ कहते थे .. सब एक उपदेश सा लगता था , आप कहते थे जीवन एक रिले रेस है जिसमे बैटन को लेकर दौड़ना होता है और अपना चक्कर पूरा करके बैटन को अगले को थमाना होता है . मुझे नहीं पता था आप अपना चक्कर इतना जल्दी पूरा कर लेंगे ... मैं तो आपसे मिली बैटन लेकर अब तक दौड़ रहा हूँ और ये चक्कर है कि पूरा होता दीखता ही नहीं ..। आप अक्सर अपने हाथों की उँगलियों को पिरामिड की तरह जोड़ कर समझाते थे .. दुनिया/जीवन ऐसा होता है ..नीचे आधार चौड़ा ओर बहुत भीड़ भरा होता है .. जैसे जैसे ऊंचाई छूते है वैसे वैसे भीड़ छंटती जाती है .. शिखर पे (पिरामिड के) कोई एक खड़ा होता वहां पैर रखने की जगह जो कम होती है ...। मैं कुछ नही समझ पाता था आपकी ये बड़ी बड़ी बातें ..मैं तो सिर्फ आपका लाड पाना चाहता था ..।
मुझे भली प्रकार याद है जब मै ग्यारवीं में आया .. विषय चुनना था , आपने सिर्फ इतना भर कहा "चुन लो जिसमे तुम अपना सर्वश्रेष्ठ दे सको .. मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की जीवन में तुम क्या कार्य करोगे .फर्क पड़ेगा तो सिर्फ तब जब तुम उसमे अपना सर्वश्रेष्ठ ना दे पाए .. तुम सड़क पे झाड़ू लगाओ लेकिन वो ऐसी लगाओ की लोग ये कह उठें .. की इससे बेहतर झाड़ू कोई लगा ही नहीं सकता.." पापा मैं तो तब भी नहीं समझा कि आप मुझे कितना प्यार करते थे .. अच्छे अंकों से स्कूल पास करके भी मैं आपसे वो नहीं सुन सका जिसके लिए मेरे कान तरसते थे - "शाबास नगेन्द्र" । मैंने कालेज में राज्य ओर राष्ट्रीय स्तर की कितनी ही वाद विवाद प्रतियोगिताये जीती ..छात्र संघ के चुनाव भी जीते ..नहीं जीत सका तो आपके वही दो शब्द ..मैं कितना पुलकित होता था मन में जब बहुत से सांसद, एम्.एल.ए. मंत्री सुबह सुबह घर आकर आपकी चिरौरी किया करते थे ।
वर्ष 1990 में आप बीमार हुए, डाक्टर के अनुसार आपको कैंसर था ..आप वैसे ही मुस्कुरा रहे थे जैसे कुछ हुआ ही ना हो .. फिर पैसे के आभाव में वो इलाज शुरू करने का इन्तजार .. ओर खुद्दारी में किसी से मदद ना लेना . कितनी जिद्द , मुझे याद है आपके साथ वो मुंबई में कटा एक साल प्रतिदिन आपको दलिया बना कर खिलाता था .. तब अकेला था तो सोचता था पूछूँ कि आपने कभी क्यों नहीं कभी कहा कि आप भी मुझे प्यार करते हैं .. बस नहीं पुछा .. तब भी आप वैसी ही बातें किया करते थे .. बड़ी बड़ी ..और मैं बस सुनता था ..। मुझे याद है अप्रेल 1991 , कफ परेड , वर्ड-ट्रेड सेण्टर के सामने खड़े होकर मेरे कंधे पे हाथ रख कर आपका मुझसे वो वादा लेना .. कि मैं मेरी माँ का बहुत ध्यान रखूँगा ..पापा मैं आज बीस वर्ष बाद भी अपने उस वादे पे कायम हूँ .. आप कहते थे जीवन में एक पीढ़ी शत-प्रतिशत को लक्ष्य बना कर शुन्य से शुरू करती है ओर लगभग 40 -50 तक पहुँच पाती है, उससे अगली पीढ़ी कि गिनती उसके आगे से शुरू होती है और संघर्ष अक्सर 0 -40 का होता है .. उसके आगे जीवन ठहर कर आराम से आगे बढ़ता जाता है ओर सौ तक का सफ़र आसन होता जाता है .. पापा मैं तब नहीं समझा था .. पर आज जाना हूँ .. आपकी नीव पर मैं वो ईमारत बना रहा हूँ बिना किसी जोर के ..और अब समझा हूँ आप कितना प्यार करते थे मुझे ।
सावन माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी , आज के दिन 1991 में आपने जो बैटन मुझे पकड़ाई थी मैं उसे लेकर बदहवास सा दौड़ा चला जाता हूँ इस दुनिया की भीड़ में .. कोई राह नही मिलती . ये दौड़ ख़त्म नहीं होती , माँ आपको अब भी बहुत याद करती है आप बहुत कुछ कहते थे , सच ही कहते थे .. मै तो आज भी कहता हूँ . .. मुझे सब कुछ मिला लाड के सिवा ...।
मुझे याद है, सब याद है पापा, मैं कुछ नही भूला जो जो आप कहा करते थे, सिर्फ उसे विस्तारित कर कर के अब समझ रहा हूँ ...आप नहीं हो लेकिन आपकी कही वो सब बातें अब मै आपके पोत्र से से कहता हूँ ..इसे वो बैटन जो आपने मुझे थमाई थी पकड़ने के काबिल बनाने की कोशिश करता हूँ ।

बेटियां तो चिड़ियाए हैं एक दिन उड़ जाएगी ...
नवम्बर सन 1986 की बात है, मैं कोई सोलह वर्ष का था जब भांजी अरु (महिमा) का हमारे घर में जन्म हुआ, बहुत नन्ही सी थी .. रूई की सी मुलायम और रंग में सफ़ेद ...ऑंखें भी नहीं खोलती थी और कितना रोती थी ...हम सभी बच्चों में उसे खिलाने का बड़ा चाव था ...किन्तु संभलती ही ना थी, सर्दी की गुनगुनी धुप उसे बहुत सुहाती थी .. लेकिन ठंडी रातों में वो अक्सर अपनी माँ से चिपकी रहती थी ... उसका वो जोर जोर से रोना शायद यही एक मात्र अभिव्यक्ति वो तब जानती थी .. फिर मुझे ठीक से याद है कुछ महीनो की होने के बाद उसका वो मुस्कुराना, अपने हाथ बढ़ाकर घुटनों में बल चलना और फिर न जाने कैसे एक दिन किसी सहारे को पकड़ कर अचानक खड़ा हो जाना ... ओह्ह्ह कितना सुन्दर लगा था जब वो यूँ खड़ी हुई और सबकी और देख कर मुस्कुराई ..! मुझे याद है उसका वो इशारों से बाते करना .. हर बात को इशारों में समझाना पहले पहल तो हम सभी बहुत आनंदित हुआ करते थे .. लेकिन जब वो दो-तीन साल की होकर भी नहीं बोली तो तो हम सभी कितना चिंतित थे .... सभी उसे बुलवाने का प्रयास करते थे कितनी बाते करते थे उससे लेकिन वो थी की हर बात का जवाब देती केवल इशारों में ..! पैरों में छोटी छोटी सी सुन्दर पैजनिया, सुन्दर गौर वर्ण और बोलती सी आंखे .. घर में रौनक बिखेरे रहती थी ..
फिर अचानक एक दिन उसके मुह से वो स्वर निकला जिसका इन्तजार हम सभी कितने वर्षों से कर रहे थे और तब फिर वो कुछ ही दिनों में इतनी बाते करने लगी जैसे ना जाने कब से उसे क्या क्या कहना शेष था .. मन को स्पंदित करता था ...उसका ये बालपन ... मुझे याद है उसका वो एक छोटा सा बैग टांग कर पास के विद्यालय में जाना .. उफ़ कितनी मुश्किल पड़ता था उसे ये समझाना कि ये उसके लिए बहुत जरूरी है, कितने लालच और लोभ देते थे हम सभी ... फिर धीरे-धीरे उसका अक्षर ज्ञान .. उसकी वो लिखावटें .. उसके कागज से अधिक घर कि दीवारों पे बनाये हुए चित्र ..डांटने पे भाग कर किसी दूसरी मौसी या मामा कि गोद में चढ़ जाना ... और उससे लिपट जाना .. आज सभी कुछ कल का सा याद है ..! फिर याद है ... घर में उसका पालतू श्वान "सोफ्टी" के साथ खेलना .. .क्या सामजस्य था दोनों का "सोफ्टी" अक्सर उसके रबड़-पेंसिल मुह में दबा कर भाग कर छुप जाया करती थी .. केवल मैं ही था जिसके डांटने पर वो पेन्सिल -रबड़ लौटाती थी .... मुझे याद है कि कितना समझाने पर भी श्वान के साथ खेलना उसे कितना भाता था .. उसे अपनी चादर में ढक कर सुलाना भी ..!
बच्चियां न जाने कब अचानक बड़ी हो जाती है .. हमारी गोद से बड़ी भले ही हो जाये लेकिन हमारे हिरदय से बड़ी नहीं हो सकती ....फिर महसूस किया कि उसके स्वभाव में गंभीरता आई है .. उसकी सोच में परिपक्वता भी ..दिन भागते रहे वो पढ़ती रही और बढती रही ..स्कूल से कालेज और कालेज से यूनिवर्सिटी तक का उसका वर्षों का सफ़र मेरे लिए सब कल की सी बाते हैं ... ज्यों- ज्यों वो बड़ी होती गई त्यों- त्यों .. उसमे बहुत से परिवर्तन आये लेकिन हमारे लिए तो वही अरु थी जिसको गोद में खिलाया था जिसके बचपन के हम साक्षी है ... अब इन दिनों में कभी कभी दीदी के जाते तो दीदी जान बूझ कर उससे चाय बनवाती थी .. कभी आखिर का गुथा हुआ आटा छोड़ कर कुछ फुल्के सिकवती थी ....
अभी कुछ महीने पहले दीदी ने खबर भेजी कि अरु की सगाई तय कर दी गई है ...सुन कर बहुत ख़ुशी हुई .. लेकिन तब भी ऐसा ना लगा कि अब वो पराई होने जा रही है ... वो तो अब तक ना केवल अपने घर की वरन अपने ननिहाल में भी रौनक थी .. उसका बचपन में चहकना और बड़ी होकर गंभीर हो जाना हमारे लिए कोई विशेष अंतर नहीं डालता था .... फिर वो दिन भी आ गया जब कल उसका विवाह हुआ .. मैंने देखा सप्तपदी संस्कार में दीदी लगातार अपने आंसू पौंछ रही थी .. जीजा सा के चेहरे पर एक गंभीर मुस्कान थी ...सभी अपने काम में व्यस्त थे .. लेकिन अरु हर पल अब पराई हो रही थी ...लगता था जैसे कलेजे का टुकड़ा कहीं किसी को सौंपा जा रहा हो ... हजारों लोगो ने विवाह में शिरकत की .. खूब नाच गाना, मिठाइयाँ, जेवर, नए नए कपडे ... घर के भीतर बहार सजावटे ... लेकिन अग्नि को साक्षी करके उसका हाथ अब घर के बड़ों ने एक ऐसे जीवनसाथी के हाथ में दे दिया था जिसकी इच्छा ही अब अरु की इच्छा है .... उसने कितनी सहजता से इसे स्वीकार भी कर लिया, आज से वो उसके दीर्घ जीवन और उसके परिवार की खुशियों के लिए व्रत-पूजा किया करेगी ... उपनाम से लेकर परिवार का गोत्र तक सब बदल गया उसका .... हम सभी परिजन, मित्र, कहीं पीछे छूट गए ....कल तक हमसे पूछ कर घर से बाहर कदम रखने वाली ने अब से अपने आपको सहर्ष एक अनजान परिवार की इच्छाओं के अधीन कर लिया ...वो सभी रीति रिवाज, खान पान तक बदल लेगी जो अब तक 25 वर्षों में उसने अपने घर और ननिहाल में सीखे थे ... उस परिवार की इच्छा अनुसार खाएगी और तदानुसार व्यवहार भी सीखेगी ...हमारे घर आने के लिए अब से उसे हमारे निमंत्रण और उनकी आज्ञा भी लेनी होगी ... अपने पसंदीदा परिधान वो अब मायके में छोड़ गई है ... वो भी अब कहीं और एक बार फिर से तय होंगे ... जिन उँगलियों को पकड़ कर उसे चलना सिखाया था उन पर मेहँदी रचने से इतना बड़ा अंतर आ जायेगा कल से पहले मुझे ऐसा कभी महसूस नहीं हुआ था .....
कल विवाह मंडप में कभी मै अरु को देखा था तो कभी अपनी दस वर्ष की लाडली अनंता को .. जो कब दस वर्ष की हो गई मुझे तो पता भी नहीं चला ... एक दिन वो भी पराई हो जाएगी ... फिर ना जाने उसके लिए कैसा घर होगा ... मुझे याद आया मेरे बाबा साहब अक्सर कहा करते थे ... "बेटियों को मत डाटो ... खूब लाड करो, इन्हें अच्छे संस्कार दो ... इनके लाड-चाव करो .. ये तो चिड़ियाए हैं एक दिन उड़ जाएगी ..." हमारी अरु कल अपना नया घर बसाने विदा हो गई ..

फिर अचानक एक दिन उसके मुह से वो स्वर निकला जिसका इन्तजार हम सभी कितने वर्षों से कर रहे थे और तब फिर वो कुछ ही दिनों में इतनी बाते करने लगी जैसे ना जाने कब से उसे क्या क्या कहना शेष था .. मन को स्पंदित करता था ...उसका ये बालपन ... मुझे याद है उसका वो एक छोटा सा बैग टांग कर पास के विद्यालय में जाना .. उफ़ कितनी मुश्किल पड़ता था उसे ये समझाना कि ये उसके लिए बहुत जरूरी है, कितने लालच और लोभ देते थे हम सभी ... फिर धीरे-धीरे उसका अक्षर ज्ञान .. उसकी वो लिखावटें .. उसके कागज से अधिक घर कि दीवारों पे बनाये हुए चित्र ..डांटने पे भाग कर किसी दूसरी मौसी या मामा कि गोद में चढ़ जाना ... और उससे लिपट जाना .. आज सभी कुछ कल का सा याद है ..! फिर याद है ... घर में उसका पालतू श्वान "सोफ्टी" के साथ खेलना .. .क्या सामजस्य था दोनों का "सोफ्टी" अक्सर उसके रबड़-पेंसिल मुह में दबा कर भाग कर छुप जाया करती थी .. केवल मैं ही था जिसके डांटने पर वो पेन्सिल -रबड़ लौटाती थी .... मुझे याद है कि कितना समझाने पर भी श्वान के साथ खेलना उसे कितना भाता था .. उसे अपनी चादर में ढक कर सुलाना भी ..!
बच्चियां न जाने कब अचानक बड़ी हो जाती है .. हमारी गोद से बड़ी भले ही हो जाये लेकिन हमारे हिरदय से बड़ी नहीं हो सकती ....फिर महसूस किया कि उसके स्वभाव में गंभीरता आई है .. उसकी सोच में परिपक्वता भी ..दिन भागते रहे वो पढ़ती रही और बढती रही ..स्कूल से कालेज और कालेज से यूनिवर्सिटी तक का उसका वर्षों का सफ़र मेरे लिए सब कल की सी बाते हैं ... ज्यों- ज्यों वो बड़ी होती गई त्यों- त्यों .. उसमे बहुत से परिवर्तन आये लेकिन हमारे लिए तो वही अरु थी जिसको गोद में खिलाया था जिसके बचपन के हम साक्षी है ... अब इन दिनों में कभी कभी दीदी के जाते तो दीदी जान बूझ कर उससे चाय बनवाती थी .. कभी आखिर का गुथा हुआ आटा छोड़ कर कुछ फुल्के सिकवती थी ....
अभी कुछ महीने पहले दीदी ने खबर भेजी कि अरु की सगाई तय कर दी गई है ...सुन कर बहुत ख़ुशी हुई .. लेकिन तब भी ऐसा ना लगा कि अब वो पराई होने जा रही है ... वो तो अब तक ना केवल अपने घर की वरन अपने ननिहाल में भी रौनक थी .. उसका बचपन में चहकना और बड़ी होकर गंभीर हो जाना हमारे लिए कोई विशेष अंतर नहीं डालता था .... फिर वो दिन भी आ गया जब कल उसका विवाह हुआ .. मैंने देखा सप्तपदी संस्कार में दीदी लगातार अपने आंसू पौंछ रही थी .. जीजा सा के चेहरे पर एक गंभीर मुस्कान थी ...सभी अपने काम में व्यस्त थे .. लेकिन अरु हर पल अब पराई हो रही थी ...लगता था जैसे कलेजे का टुकड़ा कहीं किसी को सौंपा जा रहा हो ... हजारों लोगो ने विवाह में शिरकत की .. खूब नाच गाना, मिठाइयाँ, जेवर, नए नए कपडे ... घर के भीतर बहार सजावटे ... लेकिन अग्नि को साक्षी करके उसका हाथ अब घर के बड़ों ने एक ऐसे जीवनसाथी के हाथ में दे दिया था जिसकी इच्छा ही अब अरु की इच्छा है .... उसने कितनी सहजता से इसे स्वीकार भी कर लिया, आज से वो उसके दीर्घ जीवन और उसके परिवार की खुशियों के लिए व्रत-पूजा किया करेगी ... उपनाम से लेकर परिवार का गोत्र तक सब बदल गया उसका .... हम सभी परिजन, मित्र, कहीं पीछे छूट गए ....कल तक हमसे पूछ कर घर से बाहर कदम रखने वाली ने अब से अपने आपको सहर्ष एक अनजान परिवार की इच्छाओं के अधीन कर लिया ...वो सभी रीति रिवाज, खान पान तक बदल लेगी जो अब तक 25 वर्षों में उसने अपने घर और ननिहाल में सीखे थे ... उस परिवार की इच्छा अनुसार खाएगी और तदानुसार व्यवहार भी सीखेगी ...हमारे घर आने के लिए अब से उसे हमारे निमंत्रण और उनकी आज्ञा भी लेनी होगी ... अपने पसंदीदा परिधान वो अब मायके में छोड़ गई है ... वो भी अब कहीं और एक बार फिर से तय होंगे ... जिन उँगलियों को पकड़ कर उसे चलना सिखाया था उन पर मेहँदी रचने से इतना बड़ा अंतर आ जायेगा कल से पहले मुझे ऐसा कभी महसूस नहीं हुआ था .....
कल विवाह मंडप में कभी मै अरु को देखा था तो कभी अपनी दस वर्ष की लाडली अनंता को .. जो कब दस वर्ष की हो गई मुझे तो पता भी नहीं चला ... एक दिन वो भी पराई हो जाएगी ... फिर ना जाने उसके लिए कैसा घर होगा ... मुझे याद आया मेरे बाबा साहब अक्सर कहा करते थे ... "बेटियों को मत डाटो ... खूब लाड करो, इन्हें अच्छे संस्कार दो ... इनके लाड-चाव करो .. ये तो चिड़ियाए हैं एक दिन उड़ जाएगी ..." हमारी अरु कल अपना नया घर बसाने विदा हो गई ..

इस दुनिया में गरीब को शायद दुखी होने का अधिकार भी अमीरों से मांगना पड़ता है
आज सुबह सुबह ठण्ड में वो घर की काम वाली बाई आज फिर नहीं आई, घर के सौहार्द के लिए उसने ये अच्छा नहीं किया .. सुबह से किट -किट, हर बात पर भुनभुनाना ..... रसोई घर से बर्तनों के खटकने की लगातार आवाजें .. बच्चों पर खीज .. दैनिक प्राथमिकताओं में अचानक आये इस परिवर्तन ने हमेशा की भांति घर का माहौल बदल दिया .... रसोई से लगातार आवाजें आ रही थी कहा जा रहा था कि ...." इस बाई को अब आने दो .. अभी पिछले महीने में ही उसे नयी साडी दी थी, उससे पिछले महीने में पगार बढाई थी .. घर में बचा हुआ खाना रोजाना उसे ही देती हूँ, उसकी बेटी की शादी में ......दिया था .. घर में रोजाना झाड़ू - पौंछे के बाद उसे गरम चाय पिलाती हूँ ... ठंन्न से एक कटोरी के जमीन पर गिरने की आवाज .... अरे मोटर चला दो ... अखबार तो बाद में ही पढ़ लेना ... छुट्टी क्या सिर्फ तुम्हारे लिए है .... उस बाई को तो आने ही दो .. उसे सबक ना सिखाया तो .. चीकू तुम अब पढने का क्या लोगे ... अनंता तुम जा कर आज अपने आप नहा लो ... अभी दो दिन पहले ही इस बाई को वो सारे पुराने गरम कपडे दिए थे ..इन पर रहम करो तो सर पे चढ़े जाते हैं .. ब्लाह ब्लाह ......" घर में सुबह सुबह इस कोहराम के बीच अखबार में मुह छिपाए मैं मन ही मन पत्नी के प्रति मेरी सहृदयता के चलते थोडा भावुक हो चला था ....और पत्नी के भावों के साथ दूर तक बह निकला था ।
आज तय था कि अब ये बुजुर्ग बंगाली "कामवाली बाई" जब भी लौटेगी मेरी पत्नी के कोप से मैं उसे बचा न सकूँगा .. सच में बर्दाश्त की भी तो एक हद होती है .. पत्नी लगातार क्रोध में थी .."कह कर भी तो छुट्टी कर सकती है .... जब देखो तब बहाने .. आज मैं बीमार हो गई थी .. तब बच्ची बीमार हो गई थी ... उस दिन आदमी से झगडा हो गया था ... किसी दिन पडौस में पानी को लेकर मारपीट हो गई थी .... नित्य नए बहाने और अचानक छुट्टी ..आने दो अब उसे ...." मैंने अब भी अखबार में मुह छिपाया हुआ था ...चाह कर भी पत्नी कि कोई मदद नहीं कर सकता था ... घर के काम में उसका हाथ बटाऊ तो अपनी ही माँ के सामने "जोरू का गुलाम" ना कहलाऊ? माँ भी अब मोर्चा संभाल चुकी थी सहयोग के अपनी उम्र और श्रधानुसार अनुसार उन्होंने भी घर में डस्टिंग जैसा कोई काम शुरू कर दिया था ... बच्चे सहमे से ठी.ठी दांत निकाल रहे थे .. शैतान बिटिया अपनी माँ के लिए कह रही रही थी .."पापा अब आपकी खैर नहीं मम्मी एक बार शुरू हो जाये तो mp3 की तरह है ... रिकार्ड अब घंटों तक बजता ही रहेगा .." मैं तो उसकी बात पर ठीक से मुस्कुरा भी नहीं सकता था ,,,!
एक घंटे तनावपूर्ण माहौल के बाद घर के सभी काम निपट गए ... पत्नी का मूड ठीक करने के लिए मैं रसोई में गया और उसके लिए सर्दी में अदरक-तुलसी की गरमागरम चाय बनाई ...अभी ये चाय पी ही रहे थे सीढ़ियों से "बाई" की वही चित-परिचित धम-धम आवाज सुनाई दी ... ह्रदय कांपने लगा .. लगा कि अब ये अपनी शामत बुलाने क्यों चली आई .है ... उसके घर में घुसते ही पत्नी ने उसे अपने रिमांड पर ले लिया .. तीन साल पहले जब से वो घर में आने लगी थी तब से कल तक के उसके सारे दुष्कृत्यों का ब्यौरा जैसे लिखा हुआ रखा था .. उसने कब कब घर का क्या क्या नुक्सान किया उसे आज ही स्मरण जो कराना था ... उसे क्या क्या लाभ कब कब दिए गए यहाँ तक कि बचा हुआ दूध और खीर भी उसके बच्चों के लिए उसे दे दिया गया .... जैसे ही पत्नी कुछ शांत होती, माँ को कुछ नया याद आ जाता ...कोई 20 -25 मिनिट बीत गए वो बुजुर्ग सी दिखने वाली बाई बस गर्दन झुकाए सुनती रही ..इतने में पडौस के घर से उस बाई को पूछने एक और महिला आकर उसके साथ शामिल हो ली ....बेबस बाई .. इस चौतरफा हमले से चित्त होकर दरवाजे के पास ही ठन्डे फर्श पर धडाम से सर पकड़ कर बैठ गई ..!
कोहाराम के बाद कुछ देर निस्तभता छाई रही फिर "बाई" ने अपने घुटनों से सर उठाया और रूआंसे टूटते से स्वर में बोली "आप मेरा हिसाब कर दीजिये .. मुझे उसका दाहसंस्कार करवाना है ... कल रात मेरा आदमी मर गया ,,, " कहते कहते वो फफक पड़ी सुनते ही माँ और पत्नी के चेहरे के भाव फक्क पड़ गए ....पड़ोसन भी सन्न रह गई .. अब बाई ने अपनी टूटी-फूटी हिंदी में कहना शुरू किया जिसका सार ये था कि उसने उपस्थित तीनो महिलाओं से कहा कि रूखा सूखा खाकर वो अब तक किसी तरह 8 "बड़े घरों" में रोजाना काम किया करती थी ... ऐसे घरों में जहाँ कि महिलाओं से केवल अपने घरों का काम नहीं होता अथवा घर के ऐसे "निम्न कोटि के कामों" के लिए वो नहीं नहीं हैं .. उनके जैसे 8 घरों में वो इस 65 वर्ष उम्र में काम किया करती है ...,, वो क्या करती थी उसकी गरीबी उससे करवाती थी ... बच्चों के लिए इन बड़ों घरों कुछ खाने को मिल जाता था ... खैर मकान मालिक ने अब उसके लाश घर के बाहर रख दी है ... बच्चों को उसके पास बिठा कर आई हूँ .. बस्ती के लोग जमा हैं .. जलाने के लिए लकड़ी और उसके लिए पैसे चाहिए मेरा हिसाब कर दीजिये .... वो आदमी के मरने से घर में "स्यावड़" / आड़ भी हो गई है तो आप लोगों कि रसोई में आ न सकुंगी ... !
पत्नी चुप-चाप सोफे से उठी .... अलमारी खोली कुछ रुपये निकले और बिना गिने से उसके हाथ में रख दिए .. ऑंखें उसकी भी छलछला आई थी धीरे से बोली "इन्हें आपके साथ भेज रही हूँ कोई और भी जरुरत हो तो निःसंकोच कह देना ..वैसे आपका नाम क्या है ..?" बाई ने धीरे से जवाब दिया "मेरे बाबा मुझे कोकी बुलाते थे .." मैं टेबल से उठा,... और उसके साथ हो लिया ..इस दुनिया में गरीब को शायद दुखी होने का अधिकार भी अमीरों से मांगना पड़ता है !

आज तय था कि अब ये बुजुर्ग बंगाली "कामवाली बाई" जब भी लौटेगी मेरी पत्नी के कोप से मैं उसे बचा न सकूँगा .. सच में बर्दाश्त की भी तो एक हद होती है .. पत्नी लगातार क्रोध में थी .."कह कर भी तो छुट्टी कर सकती है .... जब देखो तब बहाने .. आज मैं बीमार हो गई थी .. तब बच्ची बीमार हो गई थी ... उस दिन आदमी से झगडा हो गया था ... किसी दिन पडौस में पानी को लेकर मारपीट हो गई थी .... नित्य नए बहाने और अचानक छुट्टी ..आने दो अब उसे ...." मैंने अब भी अखबार में मुह छिपाया हुआ था ...चाह कर भी पत्नी कि कोई मदद नहीं कर सकता था ... घर के काम में उसका हाथ बटाऊ तो अपनी ही माँ के सामने "जोरू का गुलाम" ना कहलाऊ? माँ भी अब मोर्चा संभाल चुकी थी सहयोग के अपनी उम्र और श्रधानुसार अनुसार उन्होंने भी घर में डस्टिंग जैसा कोई काम शुरू कर दिया था ... बच्चे सहमे से ठी.ठी दांत निकाल रहे थे .. शैतान बिटिया अपनी माँ के लिए कह रही रही थी .."पापा अब आपकी खैर नहीं मम्मी एक बार शुरू हो जाये तो mp3 की तरह है ... रिकार्ड अब घंटों तक बजता ही रहेगा .." मैं तो उसकी बात पर ठीक से मुस्कुरा भी नहीं सकता था ,,,!
एक घंटे तनावपूर्ण माहौल के बाद घर के सभी काम निपट गए ... पत्नी का मूड ठीक करने के लिए मैं रसोई में गया और उसके लिए सर्दी में अदरक-तुलसी की गरमागरम चाय बनाई ...अभी ये चाय पी ही रहे थे सीढ़ियों से "बाई" की वही चित-परिचित धम-धम आवाज सुनाई दी ... ह्रदय कांपने लगा .. लगा कि अब ये अपनी शामत बुलाने क्यों चली आई .है ... उसके घर में घुसते ही पत्नी ने उसे अपने रिमांड पर ले लिया .. तीन साल पहले जब से वो घर में आने लगी थी तब से कल तक के उसके सारे दुष्कृत्यों का ब्यौरा जैसे लिखा हुआ रखा था .. उसने कब कब घर का क्या क्या नुक्सान किया उसे आज ही स्मरण जो कराना था ... उसे क्या क्या लाभ कब कब दिए गए यहाँ तक कि बचा हुआ दूध और खीर भी उसके बच्चों के लिए उसे दे दिया गया .... जैसे ही पत्नी कुछ शांत होती, माँ को कुछ नया याद आ जाता ...कोई 20 -25 मिनिट बीत गए वो बुजुर्ग सी दिखने वाली बाई बस गर्दन झुकाए सुनती रही ..इतने में पडौस के घर से उस बाई को पूछने एक और महिला आकर उसके साथ शामिल हो ली ....बेबस बाई .. इस चौतरफा हमले से चित्त होकर दरवाजे के पास ही ठन्डे फर्श पर धडाम से सर पकड़ कर बैठ गई ..!
कोहाराम के बाद कुछ देर निस्तभता छाई रही फिर "बाई" ने अपने घुटनों से सर उठाया और रूआंसे टूटते से स्वर में बोली "आप मेरा हिसाब कर दीजिये .. मुझे उसका दाहसंस्कार करवाना है ... कल रात मेरा आदमी मर गया ,,, " कहते कहते वो फफक पड़ी सुनते ही माँ और पत्नी के चेहरे के भाव फक्क पड़ गए ....पड़ोसन भी सन्न रह गई .. अब बाई ने अपनी टूटी-फूटी हिंदी में कहना शुरू किया जिसका सार ये था कि उसने उपस्थित तीनो महिलाओं से कहा कि रूखा सूखा खाकर वो अब तक किसी तरह 8 "बड़े घरों" में रोजाना काम किया करती थी ... ऐसे घरों में जहाँ कि महिलाओं से केवल अपने घरों का काम नहीं होता अथवा घर के ऐसे "निम्न कोटि के कामों" के लिए वो नहीं नहीं हैं .. उनके जैसे 8 घरों में वो इस 65 वर्ष उम्र में काम किया करती है ...,, वो क्या करती थी उसकी गरीबी उससे करवाती थी ... बच्चों के लिए इन बड़ों घरों कुछ खाने को मिल जाता था ... खैर मकान मालिक ने अब उसके लाश घर के बाहर रख दी है ... बच्चों को उसके पास बिठा कर आई हूँ .. बस्ती के लोग जमा हैं .. जलाने के लिए लकड़ी और उसके लिए पैसे चाहिए मेरा हिसाब कर दीजिये .... वो आदमी के मरने से घर में "स्यावड़" / आड़ भी हो गई है तो आप लोगों कि रसोई में आ न सकुंगी ... !
पत्नी चुप-चाप सोफे से उठी .... अलमारी खोली कुछ रुपये निकले और बिना गिने से उसके हाथ में रख दिए .. ऑंखें उसकी भी छलछला आई थी धीरे से बोली "इन्हें आपके साथ भेज रही हूँ कोई और भी जरुरत हो तो निःसंकोच कह देना ..वैसे आपका नाम क्या है ..?" बाई ने धीरे से जवाब दिया "मेरे बाबा मुझे कोकी बुलाते थे .." मैं टेबल से उठा,... और उसके साथ हो लिया ..इस दुनिया में गरीब को शायद दुखी होने का अधिकार भी अमीरों से मांगना पड़ता है !

अपूर्व आगे बढ़ो और मुझे हरा दो बेटा ...
अपूर्व, बेटा आज तुम सोलह वर्ष के हो गए हो, अभी कल की सी बात है जब 22 फ़रवरी 1996 की रात बारह बज कर चालीस मिनिट पर तुमने मुझे जीने का एक नया और विलक्षण कारण दिया था। सुबह से तुम्हारी माँ कितनी तकलीफ में थी और मैं कितना चिंतित .. आज तुमसे साझा करना चाहता हूँ उस दिन तुम्हारे पैदा होने तक तुमसे अधिक चिंता मुझे तुम्हारी माँ की थी । विधि के अनुसार तुम्हारे इस संसार में आने का अभी समय नहीं हुआ था लेकिन डाक्टर ने कह दिया था तुम कोई डेढ़ महीने पहले ही मुझे मिलना चाहते हो .. तुम आ रहे हो ।
मुझे याद है वो शब्द जो मेरे मामा सा ने 23 फ़रवरी की सुबह पांच बजे अस्पताल में घुसते ही कहे थे "आओ बेटे के बाप" ओह्ह्ह ! मैं फूला नहीं समाया था तब .. मुझे सूचित भी नहीं किया जा सका था की देर रात तुम आ भी गए हो .. घर में फ़ोन जो नहीं था ..! तुम्हे एक पल देख लेने को कितना आतुर हो गया था मैं .. मुझे याद है सुबह सुबह तुम अपनी दादी की गोद में छोटे से सिमटे हुए ....फिर सीधा एक्स-रे की टेबिल पर मेरा वो तुमसे पहला साक्षात्कार .. उफ्फ्फ ! सच में डर गया था मैं तुम्हे देख कर एक बहुत छोटे से लाल लाल .. अर्ध विकसित से तुम्हारी उंगलियाँ किसी नर्म पौधे की शाख ...कमजोरी के कारण तुमसे रोया भी ना गया था तब ... डाक्टर ने जो तुम्हारे बारे में मुह से कहा उसे तो मैं लिख भी नहीं पाउँगा ...! पैदा होने के साथ ही सर में पानी, चेस्ट और यूरीन में संक्रमण और ना जाने क्या क्या और सिर्फ डेढ़ किलो वजन ..! नन्ही सी जान पर जैसे सारी दुश्वारियां एक साथ हमलावर थीं ..।
फिर अनवरत सिलसिला शुरू हुआ तुम्हे हर दुसरे दिन डाक्टर के पास लेकर जाने का, तुम्हारे टेस्ट करने का ... लगता था जैसे तुम अबोध शिशु नहीं डाक्टरों की प्रयोगशाला हो ... कितने निर्दयी थे वे सब जो तुम्हारे शरीर में सूइयां चुभोते थे ... मैं सच कहता हूँ उन सब सुइयों का दर्द मैंने तुम्हारे साथ साथ महसूस किया है बेटा ..! मुझे याद है एक बार वो डाक्टर का तुम्हे सुई चुभोना ... सुई में खून ना भरना ...डाक्टर का तुम्हारे कोमल से हाथ को निचौड़ना .. मेरी आँखों के आगे अँधेरा सा छा गया था .. तुम्हे याद नहीं पर मैं बेहोश होकर गिर पड़ा था ये देख कर ...।
अपूर्व, बेटा मुझे याद है वो तुम्हारा दिन भर सोना और कोई दो साल तक रात रात भर जागना .. मैं तो जैसे सोना भूल ही गया था .. दिन में डाक्टरों के चक्कर लगाना, ऑफिस जाना और रात भर तुम्हे अपनी गोदियों में झुलाना ... तुम्हे कैसे बताऊँ .. कि तब मैं कितना सोना चाहता था ... लेट कर अपने पैर घुटनों से समेट लेता था .. तुम्हे अपने पेट पर बिठा लेता था ...अपने घुटनों का सहारा तुम्हारी पीठ को देता था और फिर अपने पैरों में कम्पन सा पैदा करता था घंटो तक ... तुम आनंदित होते थे .. रात भर यूँ ही .. और जैसे ही वो कम्पन रुकता था .. तुम्हारा जोर जोर से रोना ... और अब क्या लिखूं मुझे तो ये भी याद है .. वो रात भर में तुम मेरे वस्त्र और मुझे कितनी बार गीला करते थे .. हा हा हा ! जब दिन में तुम दुसरे कमरे में होते थे .. तो इन्फेक्शन के डर से नौकरानी को उस कमरे में घुसना वर्जित था .. अपने हाथों से उस कमरे को साफ़ किया करता था क्योंकि तब तुम्हारी माँ ये सब नहीं कर सकती थी ..!
अपूर्व मुझे याद है वो तुम्हारा मीठा सा पहला स्वर जो एक-डेढ़ वर्ष बाद मेरे कानो में पड़ा था .. तुम्हारा हर वो पल मेरे अपने निजी दस्तावेजों में दर्ज है ..! तुम्हारा वो छोटी छोटी खिलौना कारों से खेलना ..वो तुम्हारी कचरा गाडी ... वो सड़क पे बरातों में बजते बैंड पे तुम्हारा मेरी गोदी में चढ़े चढ़े ही नाचना ......तुम्हारा पहली बार विद्यालय जाना ... वहां से पहले ही दिन तुम्हारी विलक्षण बुद्धि की तारीफ .... फिर एक उससे भी बड़े प्रतिष्ठित विद्यालय में दाखिला मिलना ..तुम्हारा इठला-इठला कर चलना .. तुम्हारा तुतलाना .. तब से तुम ज्ञान प्राप्ति के एक लम्बे सफ़र में निकल पड़े हो .... और आज बहुत से मामलों में मुझसे बहुत आगे निकल चुके हो .. सच कहता हूँ तुम्हारा और मेरा रिश्ता एक ऐसा रिश्ता है जिसमे मैं हमेशा खुद को तुमसे हर मामले में हारता हुआ देख कर ही सुख का अनुभव करता हूँ .. तुम दसवी कक्षा में आ गए हो, आज तक तुम्हारी सहृदयता, सद्चरित्र, विलक्षण स्मरण शक्ति, सुन्दर अभिव्यक्तियों और ना जाने कितनी ही बातों ने मुझे तुम पे इठलाने के लिए कारण दिया है ... लेकिन तुमसे ना जाने क्यू ... क्या सोच कर ये सब मैं कह नहीं सका ..बेटा तुम मुझसे बहुत आगे निकल जाओ .. लोग अब तक तुम्हे मेरे नाम से पहचानते हैं शीघ्र ही मुझे तुम्हारे नाम से पहचाने ..।
अब तक तुम छोटी छोटी जिद करते थे .. मैं पूरी करता था .. मेरे बचपन के अभावों के साए से भी तुम्हे दूर रखने की यथेष्ट चेष्टा की है मैंने ..आज अब खुद से जिद करो .. जीवन में वो हासिल करो जिसके लिए तुम्हे ईश्वर ने ये विलक्षण क्षमताएं दी है .....मेरे बराबर लम्बाई में आने लगे हो यहाँ भी मुझ से बहुत ऊपर निकल जाओ बेटा ..! हमारे परिवार की थाती हो तुम ... ज्ञान, यश-मान प्रतिष्ठा, धन अर्जित करो .. खुद से वादा करो ..अब समय आ गया है .. इन दो वर्षों मेहनत तुम्हे जीवन भर सुख देगी और इन दो वर्षों की मौज जीवन भर संघर्षरत रखेगी। चयन तुम्हे करना है बेटा मेरे और तुम्हारे अपने भविष्य का । आगे बढ़ो और मुझे हरा दो ... सारी दुनिया जीत लो अपूर्व ..। तुम्हारे जन्मदिन पर तुम्हे ढेर सारा लाड और शुभाशीष ..बेटा !
मुझे याद है वो शब्द जो मेरे मामा सा ने 23 फ़रवरी की सुबह पांच बजे अस्पताल में घुसते ही कहे थे "आओ बेटे के बाप" ओह्ह्ह ! मैं फूला नहीं समाया था तब .. मुझे सूचित भी नहीं किया जा सका था की देर रात तुम आ भी गए हो .. घर में फ़ोन जो नहीं था ..! तुम्हे एक पल देख लेने को कितना आतुर हो गया था मैं .. मुझे याद है सुबह सुबह तुम अपनी दादी की गोद में छोटे से सिमटे हुए ....फिर सीधा एक्स-रे की टेबिल पर मेरा वो तुमसे पहला साक्षात्कार .. उफ्फ्फ ! सच में डर गया था मैं तुम्हे देख कर एक बहुत छोटे से लाल लाल .. अर्ध विकसित से तुम्हारी उंगलियाँ किसी नर्म पौधे की शाख ...कमजोरी के कारण तुमसे रोया भी ना गया था तब ... डाक्टर ने जो तुम्हारे बारे में मुह से कहा उसे तो मैं लिख भी नहीं पाउँगा ...! पैदा होने के साथ ही सर में पानी, चेस्ट और यूरीन में संक्रमण और ना जाने क्या क्या और सिर्फ डेढ़ किलो वजन ..! नन्ही सी जान पर जैसे सारी दुश्वारियां एक साथ हमलावर थीं ..।
फिर अनवरत सिलसिला शुरू हुआ तुम्हे हर दुसरे दिन डाक्टर के पास लेकर जाने का, तुम्हारे टेस्ट करने का ... लगता था जैसे तुम अबोध शिशु नहीं डाक्टरों की प्रयोगशाला हो ... कितने निर्दयी थे वे सब जो तुम्हारे शरीर में सूइयां चुभोते थे ... मैं सच कहता हूँ उन सब सुइयों का दर्द मैंने तुम्हारे साथ साथ महसूस किया है बेटा ..! मुझे याद है एक बार वो डाक्टर का तुम्हे सुई चुभोना ... सुई में खून ना भरना ...डाक्टर का तुम्हारे कोमल से हाथ को निचौड़ना .. मेरी आँखों के आगे अँधेरा सा छा गया था .. तुम्हे याद नहीं पर मैं बेहोश होकर गिर पड़ा था ये देख कर ...।
अपूर्व, बेटा मुझे याद है वो तुम्हारा दिन भर सोना और कोई दो साल तक रात रात भर जागना .. मैं तो जैसे सोना भूल ही गया था .. दिन में डाक्टरों के चक्कर लगाना, ऑफिस जाना और रात भर तुम्हे अपनी गोदियों में झुलाना ... तुम्हे कैसे बताऊँ .. कि तब मैं कितना सोना चाहता था ... लेट कर अपने पैर घुटनों से समेट लेता था .. तुम्हे अपने पेट पर बिठा लेता था ...अपने घुटनों का सहारा तुम्हारी पीठ को देता था और फिर अपने पैरों में कम्पन सा पैदा करता था घंटो तक ... तुम आनंदित होते थे .. रात भर यूँ ही .. और जैसे ही वो कम्पन रुकता था .. तुम्हारा जोर जोर से रोना ... और अब क्या लिखूं मुझे तो ये भी याद है .. वो रात भर में तुम मेरे वस्त्र और मुझे कितनी बार गीला करते थे .. हा हा हा ! जब दिन में तुम दुसरे कमरे में होते थे .. तो इन्फेक्शन के डर से नौकरानी को उस कमरे में घुसना वर्जित था .. अपने हाथों से उस कमरे को साफ़ किया करता था क्योंकि तब तुम्हारी माँ ये सब नहीं कर सकती थी ..!
अपूर्व मुझे याद है वो तुम्हारा मीठा सा पहला स्वर जो एक-डेढ़ वर्ष बाद मेरे कानो में पड़ा था .. तुम्हारा हर वो पल मेरे अपने निजी दस्तावेजों में दर्ज है ..! तुम्हारा वो छोटी छोटी खिलौना कारों से खेलना ..वो तुम्हारी कचरा गाडी ... वो सड़क पे बरातों में बजते बैंड पे तुम्हारा मेरी गोदी में चढ़े चढ़े ही नाचना ......तुम्हारा पहली बार विद्यालय जाना ... वहां से पहले ही दिन तुम्हारी विलक्षण बुद्धि की तारीफ .... फिर एक उससे भी बड़े प्रतिष्ठित विद्यालय में दाखिला मिलना ..तुम्हारा इठला-इठला कर चलना .. तुम्हारा तुतलाना .. तब से तुम ज्ञान प्राप्ति के एक लम्बे सफ़र में निकल पड़े हो .... और आज बहुत से मामलों में मुझसे बहुत आगे निकल चुके हो .. सच कहता हूँ तुम्हारा और मेरा रिश्ता एक ऐसा रिश्ता है जिसमे मैं हमेशा खुद को तुमसे हर मामले में हारता हुआ देख कर ही सुख का अनुभव करता हूँ .. तुम दसवी कक्षा में आ गए हो, आज तक तुम्हारी सहृदयता, सद्चरित्र, विलक्षण स्मरण शक्ति, सुन्दर अभिव्यक्तियों और ना जाने कितनी ही बातों ने मुझे तुम पे इठलाने के लिए कारण दिया है ... लेकिन तुमसे ना जाने क्यू ... क्या सोच कर ये सब मैं कह नहीं सका ..बेटा तुम मुझसे बहुत आगे निकल जाओ .. लोग अब तक तुम्हे मेरे नाम से पहचानते हैं शीघ्र ही मुझे तुम्हारे नाम से पहचाने ..।
अब तक तुम छोटी छोटी जिद करते थे .. मैं पूरी करता था .. मेरे बचपन के अभावों के साए से भी तुम्हे दूर रखने की यथेष्ट चेष्टा की है मैंने ..आज अब खुद से जिद करो .. जीवन में वो हासिल करो जिसके लिए तुम्हे ईश्वर ने ये विलक्षण क्षमताएं दी है .....मेरे बराबर लम्बाई में आने लगे हो यहाँ भी मुझ से बहुत ऊपर निकल जाओ बेटा ..! हमारे परिवार की थाती हो तुम ... ज्ञान, यश-मान प्रतिष्ठा, धन अर्जित करो .. खुद से वादा करो ..अब समय आ गया है .. इन दो वर्षों मेहनत तुम्हे जीवन भर सुख देगी और इन दो वर्षों की मौज जीवन भर संघर्षरत रखेगी। चयन तुम्हे करना है बेटा मेरे और तुम्हारे अपने भविष्य का । आगे बढ़ो और मुझे हरा दो ... सारी दुनिया जीत लो अपूर्व ..। तुम्हारे जन्मदिन पर तुम्हे ढेर सारा लाड और शुभाशीष ..बेटा !
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