ये बात वर्ष 1994 -95 की है जब मेरा पदस्थापन सिंचाई विभाग में था ..मुख्य अभियंता महोदय ने मुझे एक दिन अपने कक्ष में बुला कर विभाग की गोपनीय शाखा की एक रिपोर्ट तैयार करके सौंपने के लिए मुझे निर्देश दिए! मैंने ये सुन रखा था की उस शाखा के प्रभारी श्री नानगराम जी बहुत गुस्सैल बुजुर्ग , किन्तु कार्य में दक्ष और बेहद इमानदार हैं! जब मैंने उस शाखा को जानने के लिए वहां बैठना शुरू किया तो बहुत सी बाते देखी जैसे उस शाखा कुल ३ लोग पदस्थापित थे और किसी भी कागज का निस्तारण जब तक नहीं हो जाता था उस काम की चुरम सी लगी रहती थी ...! नानगराम जी अपनी जंग लगी हुई टूटे पैडिल की साईकिल से कोई १० किलोमीटर चलकर आते और सुबह ठीक १० बजे शाखा कमरा खुल जाता था, उसके बाद उसमे से शाम पांच बजे तक लोग सिर्फ सरकारी काम से ही बहार निकलते थे ! आधे आधे इंच बढ़ी हुई बेतरतीब सी खिचड़ी दाढ़ी, मुह में बीडी, बिखरे से बाल, जेब में एक टूटा हुआ नारंगी रंग का बालपैन .. घिसे हुए वस्त्र साथ में पैरों की उंगलियाँ को हवा देते हुए छेद हुए जूते .....ये हुलिया था नानगराम जी का!
जब मै सुबह सुबह उस कमरे में घुसता तो बड़े आदर सहित मुस्कुराकर वहाँ मेरा स्वागत किया जाता उसके बाद मेरे आगे एक पानी का जग (जो शायद सम्पूर्ण कार्यालय में सबसे साफ़ जग था) रख कर वहाँ मेरी मौजूदगी को भुला दिया जाता और लोग आने काम में जुटे रहते थे !
धीरे धीर मैंने उस शाखा में कुछ सुझाव दिए और उनके साथ घुलना मिलना शुरू किया .. पता नही क्यों लेकिन शायद उम्र में एक बहुत बड़े अंतर और कठोर स्वाभाव के साम्य के कारण मै नानगराम जी में अपना पिता सा व्यक्तित्व खोजने लगा शायद वो मुझसे ३० वर्ष बड़े थे ! समय बीतने लगा मैं वहाँ अपने स्वाभाव के मुताबिक हंसी ठिठोली करने लगा ... और धीरे धीरे कुछ ऐसा स्नेह मुझे उनसे होने लगा की मैंने अपना उनसे बेहतर सुविधों युक्त कमरा छोड़ दिया और उनके साथ उसी कमरे में अधिकांश समय व्यतीत करने लगा ...दिन में एक बार कमरे के अन्दर ही एक हीटर पर चाय बनाई जाती थी ...और बाकि समय सिर्फ काम !
कोई छः माह बीत गए और तब तक मैंने अपनी रिपोर्ट भी मुख्य अभियंता को सौप दी लेकिन मैं उस शाखा का होकर रह गया .. रोज कुछ न कुछ नया अनुभव सीखता रोज उस इंसान की काबिलियत और ईमानदारी से अभिभूत होता ..! कोई दो बरस बाद एक दिन मुझे ख़याल आया की नानग राम जी जिनके कमरे मै अब स्थाई रूप से बैठने लगा हूँ वो आज दिन तक मेरे कक्ष में आये ही नही है ...! तो एक दिन सुबह सुबह मैंने उनसे ये बात कह दी कि भाई साहब कल से मै आपकी इस शाखा में नही बैठूँगा ... नानग राम जी जो तब तक मुझे अपने मानस पुत्र की तरह स्नेह देने लगे थे .. सुन कर बोले .. "क्यों बेटा ? ऐसी क्या बात हो गई ?" तो मैंने उन्हें कभी मेरे कक्ष में ना आने शिकायत कह दी ..! मेरी बात सुन कर वो थोडा गंभीर हो गए ...!
जैसे किसी खालीपन को भरने के लिए वो कुछ शब्द खोजते हों ..फिर उन्होंने चित परिचित अंदाज में एक बीडी सुलगाई और मेरी आँखों में देखा ..और कहा .."बेटा जब तुम मेरे कमरे में आकर बैठते हो तो मै तुम्हारा स्वागत इस पानी के जग से करता हूँ और .. बस दोपहर को एक चाय वो भी यहीं इस कमरे में बना कर ..! जो मै तुम्हारे कमरे में आया तो तुम हो सकता है अपनी हैसियत अनुसार में सत्कार करो जैसे उसी समय एक कोफ़ी का आर्डर करो साथ में कुछ नाश्ता और मेरी इस चार आने की बीडी की जगह मुझे दो रुपये की सिगरेट ऑफ़र करो" ..... बीडी का एक और कश खींचकर उन्होंने अपनी आंख को जरा सिकोडा और आगे जो कुछ कहा वो मेरे मानस में आज यूँ का यूँ अंकित है ... "बेटा मेरा स्वाभिमान मुझसे ये कहता है कि जो सत्कार आप किसी का कर नही सकते उसे स्वीकारने का भी अधिकार आपको नही है .. यदि आपने उसे स्वीकार कर लिया तो बहुत शीघ्र आप अपनी इज्जत खो बैठेंगे .."
उनका कथन सुन कर मेरी उनके प्रति मेरी श्रद्धा कि सीमा ना रही .. यूँ लगा कि अब क्या कहूँ ... मै सिर्फ उठा और उनके पैर छू लिए ... वो मेरे लिए सरकारी नौकरी के पहले गुरु साबित हुए .. वर्ष 1998 में वो शख्स आदरसहित सेवानिवृत होकर अब घर में आराम कर रहे है . मेरा भी सिंचाई विभाग से कोई ११ वर्ष पहले स्थानांतरण हो चूका है मै अब भी जाता हूँ उनसे मिलने .. उनके चरण छूने ..और उनका वही अंदाज कायम है ... उनके गाँव जाते ही एक पानी का जग सामने साथ में बीडी बण्डल और माचिस (जो मै नही पीता फिर भी ) मेरे आगे रख दिया जाता है ..फिर थोड़ी देर में एक सफ़ेद से पुराने कप में एक अदबुध स्नेह भरी चाय ...
'जो सत्कार मै किसी का कर नही सकता वो मै अब कभी स्वीकार भी नही करता .... ' जाने कहाँ गए वो लोग जो ऐसा सोचते थे . मेरा उन्हें कोटि कोटि नमन !

जब मै सुबह सुबह उस कमरे में घुसता तो बड़े आदर सहित मुस्कुराकर वहाँ मेरा स्वागत किया जाता उसके बाद मेरे आगे एक पानी का जग (जो शायद सम्पूर्ण कार्यालय में सबसे साफ़ जग था) रख कर वहाँ मेरी मौजूदगी को भुला दिया जाता और लोग आने काम में जुटे रहते थे !
धीरे धीर मैंने उस शाखा में कुछ सुझाव दिए और उनके साथ घुलना मिलना शुरू किया .. पता नही क्यों लेकिन शायद उम्र में एक बहुत बड़े अंतर और कठोर स्वाभाव के साम्य के कारण मै नानगराम जी में अपना पिता सा व्यक्तित्व खोजने लगा शायद वो मुझसे ३० वर्ष बड़े थे ! समय बीतने लगा मैं वहाँ अपने स्वाभाव के मुताबिक हंसी ठिठोली करने लगा ... और धीरे धीरे कुछ ऐसा स्नेह मुझे उनसे होने लगा की मैंने अपना उनसे बेहतर सुविधों युक्त कमरा छोड़ दिया और उनके साथ उसी कमरे में अधिकांश समय व्यतीत करने लगा ...दिन में एक बार कमरे के अन्दर ही एक हीटर पर चाय बनाई जाती थी ...और बाकि समय सिर्फ काम !
कोई छः माह बीत गए और तब तक मैंने अपनी रिपोर्ट भी मुख्य अभियंता को सौप दी लेकिन मैं उस शाखा का होकर रह गया .. रोज कुछ न कुछ नया अनुभव सीखता रोज उस इंसान की काबिलियत और ईमानदारी से अभिभूत होता ..! कोई दो बरस बाद एक दिन मुझे ख़याल आया की नानग राम जी जिनके कमरे मै अब स्थाई रूप से बैठने लगा हूँ वो आज दिन तक मेरे कक्ष में आये ही नही है ...! तो एक दिन सुबह सुबह मैंने उनसे ये बात कह दी कि भाई साहब कल से मै आपकी इस शाखा में नही बैठूँगा ... नानग राम जी जो तब तक मुझे अपने मानस पुत्र की तरह स्नेह देने लगे थे .. सुन कर बोले .. "क्यों बेटा ? ऐसी क्या बात हो गई ?" तो मैंने उन्हें कभी मेरे कक्ष में ना आने शिकायत कह दी ..! मेरी बात सुन कर वो थोडा गंभीर हो गए ...!
जैसे किसी खालीपन को भरने के लिए वो कुछ शब्द खोजते हों ..फिर उन्होंने चित परिचित अंदाज में एक बीडी सुलगाई और मेरी आँखों में देखा ..और कहा .."बेटा जब तुम मेरे कमरे में आकर बैठते हो तो मै तुम्हारा स्वागत इस पानी के जग से करता हूँ और .. बस दोपहर को एक चाय वो भी यहीं इस कमरे में बना कर ..! जो मै तुम्हारे कमरे में आया तो तुम हो सकता है अपनी हैसियत अनुसार में सत्कार करो जैसे उसी समय एक कोफ़ी का आर्डर करो साथ में कुछ नाश्ता और मेरी इस चार आने की बीडी की जगह मुझे दो रुपये की सिगरेट ऑफ़र करो" ..... बीडी का एक और कश खींचकर उन्होंने अपनी आंख को जरा सिकोडा और आगे जो कुछ कहा वो मेरे मानस में आज यूँ का यूँ अंकित है ... "बेटा मेरा स्वाभिमान मुझसे ये कहता है कि जो सत्कार आप किसी का कर नही सकते उसे स्वीकारने का भी अधिकार आपको नही है .. यदि आपने उसे स्वीकार कर लिया तो बहुत शीघ्र आप अपनी इज्जत खो बैठेंगे .."
उनका कथन सुन कर मेरी उनके प्रति मेरी श्रद्धा कि सीमा ना रही .. यूँ लगा कि अब क्या कहूँ ... मै सिर्फ उठा और उनके पैर छू लिए ... वो मेरे लिए सरकारी नौकरी के पहले गुरु साबित हुए .. वर्ष 1998 में वो शख्स आदरसहित सेवानिवृत होकर अब घर में आराम कर रहे है . मेरा भी सिंचाई विभाग से कोई ११ वर्ष पहले स्थानांतरण हो चूका है मै अब भी जाता हूँ उनसे मिलने .. उनके चरण छूने ..और उनका वही अंदाज कायम है ... उनके गाँव जाते ही एक पानी का जग सामने साथ में बीडी बण्डल और माचिस (जो मै नही पीता फिर भी ) मेरे आगे रख दिया जाता है ..फिर थोड़ी देर में एक सफ़ेद से पुराने कप में एक अदबुध स्नेह भरी चाय ...
'जो सत्कार मै किसी का कर नही सकता वो मै अब कभी स्वीकार भी नही करता .... ' जाने कहाँ गए वो लोग जो ऐसा सोचते थे . मेरा उन्हें कोटि कोटि नमन !



