Sunday, 4 March 2012

पापा आप मुझ से बहुत कुछ कहते थे ....बहुत सिखाते थे !

मेरे पूज्यनीय पिताश्री स्वर्गीय महेंद्र जी पारीक (17 दिसम्बर 1943 - 2 अगस्त 1991 ) की पावन स्मृति में
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पापा आप तो हमेशा बहुत कुछ कहते थे बस मैं ही अब समझा हूँ लगता है जैसे ट्रेन निकल चुकी है और मैं अब भी स्टेशन के आधे रास्ते ही पहुंचा हूँ ....शायद आप सही कहते थे समझ बुढ़ापे में आती है और कमबख्त ये बुढ़ापा जवानी के बाद ! आज सहसा आपकी कही हर बात बहुत याद आती है ... मैं बचपन में बस आपका लाड तलाशता रहा और अब खुद को तलाशता हूँ ।

मुझे याद है 1975 में किस तरह आपने एक प्रतिष्ठित विद्यालय में मेरे दाखिले को अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बनाया था, आपके पत्रकार मित्रो ने कैसे रात और दिन सिर्फ मेरे खातिर एक सपना सा बुना था जैसे  सभी मुझमे अपना पुत्र खोजते थे . । मैं भूला नही हूँ अभी तक की कैसे मेरी खुशियों के लिए आप दो-दो नौकरियां किया करते थे . रात और दिन सिर्फ मैं और मेरा भविष्य आपकी आँखों में तैरता था .. मैं बस आपसे लाड चाहता थे जो अक्सर आप मुझे नहीं देते थे । आज मेरे स्मरण में आता है कि किस तरह रात 3 बजे "पत्रिका" का सम्पादकीय पेज बना कर आते थे, थके मांदे .. और अचानक सुबह 6 बजे माँ आपको यह कह कर उठा देती थी कि आज मेरा स्कूल टेम्पो नहीं आया है और आप बिना मुझ से कुछ कहें अपनी मोपेड पर मुहे बिठा कर छोड़ने निकल पड़ते थे ..।


पापा, मुझे तो सिर्फ आपसे वो लाड चाहिए था जिसकी तलाश में मैं छ दिन आपका इन्तजार किया करता था कि आज इतवार है आपसे मुलाकात होगी ... आप तो रोज ही मेरे स्कूल जाने के बाद उठते थे और मेरे सोने के बाद घर आते थे .. अब पता लगता है वो हाड-तोड़ मेहनत आप सिर्फ मेरे ही लिए किया करते थे ... मुझे इंसान बनाने के लिए .। मुझे ये भी याद है हर रविवार आपके उठते ही मैं आपके सामने जाकर बैठ जाया करता था ..आप अक्सर मेरी मौजूदगी को अनदेखा करते थे और अपना सारा लाड मेरे चचेरे भाई बहनों को लुटाया करते थे । वो आपका मेरे उन भाई बहनों से अखबार की विभिन्न ख़बरें पढवाना मुझे बहुत अखरता था .. मैं तो कब से आपके उठने से पहले ही कुछ ख़बरों को पढ़ कर शुद्द उच्चारण का रियाज किया करता था .... आपको अपना सर्वोत्कृष्ट दिखा सकूँ ...मैं कितना सोचता था तब ..सिर्फ आपका लाड पाने के लिए ..जब आप मुझे अपने पास नहीं बुलाते थे तो मुझे बहुत बुरा लगता था . तनाव होता था .. मैं आपके सामने बैठ कर उंगलिया मोड़ता .. अजीबो गरीब हरकतें करता .. तब आप मुझे असामान्य देखते और मुझे लताड़ देते ..मेरे साथ मेरी माँ को भी क्योंकि अक्सर वही मुझे बिगाड़ने की तोहमत झेलती थी ..। पापा मैं तो सिर्फ आपका लाड चाहता था .. किसी दिन आपके बाजु पे आपसे चिपक कर उस खुशबु को सूंघना चाहता था .. जो आपके पसीने में मुझे आती थी ।

पापा मुझे सब याद है वो आपका मुझे डांट-डांट कर मेरे जूतों पे पालिश करना सिखाना, वो पालिश का ब्रुश पकड़ना सिखाना, वो कपड़ों पे प्रेस से सही क्रीज करना सिखाना, खाना खाते समय पांचों उँगलियों से पकड़ कर खाना सिखाना, खाते समय मुह से आवाज आने पर डांटना , और चलते समय पैर घिसने पर लताड़ना , वो हाथ के इशारों के साथ बात करने पर अपनी डांट से बुरी तरह झकझोर देना, अपनी चीजें यथा स्थान रखने के की आदत डलवाना, नहाने के बाद बाथरूम को साफ कर बहार आने की हिदायतें , सभी कुछ मेरे आज आज बहुत काम आता है , मैं स्वयं को भीड़ से अलग खड़ा पाता हूँ , बस अकेला अब अकेला हूँ आप बहुत याद आते हो ।

पापा, मैं कितनी कोशिश करता था पढाई में अव्वल , स्कूल के अन्य सभी गतिविधियों में अव्वल, सहपाठी, गुरुजन सभी तारीफ करते थे .. बस नहीं सुन पाता था तो आपके मुह से वो एक शब्द "शाबास बेटा" .. मैं बस आपका लाड पाना चाहता था और वही नहीं पाता था ...। आप "शाबास" के आलावा कितना कुछ कहते थे .. सब एक उपदेश सा लगता था , आप कहते थे जीवन एक रिले रेस है जिसमे बैटन को लेकर दौड़ना होता है और अपना चक्कर पूरा करके बैटन को अगले को थमाना होता है . मुझे नहीं पता था आप अपना चक्कर इतना जल्दी पूरा कर लेंगे ... मैं तो आपसे मिली बैटन लेकर अब तक दौड़ रहा हूँ और ये चक्कर है कि पूरा होता दीखता ही नहीं ..। आप अक्सर अपने हाथों की उँगलियों को पिरामिड की तरह जोड़ कर समझाते थे .. दुनिया/जीवन ऐसा होता है ..नीचे आधार चौड़ा ओर बहुत भीड़ भरा होता है .. जैसे जैसे ऊंचाई छूते है वैसे वैसे भीड़ छंटती जाती है .. शिखर पे (पिरामिड के) कोई एक खड़ा होता वहां पैर रखने की जगह जो कम होती है ...। मैं कुछ नही समझ पाता था आपकी ये बड़ी बड़ी बातें ..मैं तो सिर्फ आपका लाड पाना चाहता था ..।


मुझे भली प्रकार याद है जब मै ग्यारवीं में आया .. विषय चुनना था , आपने सिर्फ इतना भर कहा "चुन लो जिसमे तुम अपना सर्वश्रेष्ठ दे सको .. मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की जीवन में तुम क्या कार्य करोगे .फर्क पड़ेगा तो सिर्फ तब जब तुम उसमे अपना सर्वश्रेष्ठ ना दे पाए .. तुम सड़क पे झाड़ू लगाओ लेकिन वो ऐसी लगाओ की लोग ये कह उठें .. की इससे बेहतर झाड़ू कोई लगा ही नहीं सकता.." पापा मैं तो तब भी नहीं समझा कि आप मुझे कितना प्यार करते थे .. अच्छे अंकों से स्कूल पास करके भी मैं आपसे वो नहीं सुन सका जिसके लिए मेरे कान तरसते थे - "शाबास नगेन्द्र" । मैंने कालेज में राज्य ओर राष्ट्रीय स्तर की कितनी ही वाद विवाद प्रतियोगिताये जीती ..छात्र संघ के चुनाव भी जीते ..नहीं जीत सका तो आपके वही दो शब्द ..मैं कितना पुलकित होता था मन में जब बहुत से सांसद, एम्.एल.ए. मंत्री सुबह सुबह घर आकर आपकी चिरौरी किया करते थे ।

वर्ष 1990 में आप बीमार हुए, डाक्टर के अनुसार आपको कैंसर था ..आप वैसे ही मुस्कुरा रहे थे जैसे कुछ हुआ ही ना हो .. फिर पैसे के आभाव में वो इलाज शुरू करने का इन्तजार .. ओर खुद्दारी में किसी से मदद ना लेना . कितनी जिद्द , मुझे याद है आपके साथ वो मुंबई में कटा एक साल प्रतिदिन आपको दलिया बना कर खिलाता था .. तब अकेला था तो सोचता था पूछूँ कि आपने कभी क्यों नहीं कभी कहा कि आप भी मुझे प्यार करते हैं .. बस नहीं पुछा .. तब भी आप वैसी ही बातें किया करते थे .. बड़ी बड़ी ..और मैं बस सुनता था ..। मुझे याद है अप्रेल 1991 , कफ परेड , वर्ड-ट्रेड सेण्टर के सामने खड़े होकर मेरे कंधे पे हाथ रख कर आपका मुझसे वो वादा लेना .. कि मैं मेरी माँ का बहुत ध्यान रखूँगा ..पापा मैं आज बीस वर्ष बाद भी अपने उस वादे पे कायम हूँ .. आप कहते थे जीवन में एक पीढ़ी शत-प्रतिशत को लक्ष्य बना कर शुन्य से शुरू करती है ओर लगभग 40 -50 तक पहुँच पाती है, उससे अगली पीढ़ी कि गिनती उसके आगे से शुरू होती है और संघर्ष अक्सर 0 -40 का होता है .. उसके आगे जीवन ठहर कर आराम से आगे बढ़ता जाता है ओर सौ तक का सफ़र आसन होता जाता है .. पापा मैं तब नहीं समझा था .. पर आज जाना हूँ .. आपकी नीव पर मैं वो ईमारत बना रहा हूँ बिना किसी जोर के ..और अब समझा हूँ आप कितना प्यार करते थे मुझे ।

सावन माह के कृष्ण  पक्ष की सप्तमी , आज के दिन 1991 में आपने जो बैटन मुझे पकड़ाई थी मैं उसे लेकर बदहवास सा दौड़ा चला जाता हूँ इस दुनिया की भीड़ में .. कोई राह नही मिलती . ये दौड़ ख़त्म नहीं होती , माँ आपको अब भी बहुत याद करती है आप बहुत कुछ कहते थे , सच ही कहते थे .. मै तो आज भी कहता हूँ . .. मुझे सब कुछ मिला लाड के सिवा ...।

मुझे याद है, सब याद है पापा, मैं कुछ नही भूला जो जो आप कहा करते थे, सिर्फ उसे विस्तारित कर कर के अब समझ रहा हूँ ...आप नहीं हो लेकिन आपकी कही वो सब बातें अब मै आपके पोत्र से से कहता हूँ ..इसे वो बैटन जो आपने मुझे थमाई थी पकड़ने के काबिल बनाने की कोशिश करता हूँ ।

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