Sunday, 4 March 2012

बेटियां तो चिड़ियाए हैं एक दिन उड़ जाएगी ...

नवम्बर सन 1986 की बात है, मैं कोई सोलह वर्ष का था जब भांजी अरु (महिमा) का  हमारे घर में जन्म हुआ, बहुत नन्ही  सी थी .. रूई की सी मुलायम और रंग में सफ़ेद ...ऑंखें भी नहीं खोलती थी और कितना रोती थी ...हम सभी बच्चों में उसे खिलाने का बड़ा चाव था ...किन्तु संभलती ही ना थी, सर्दी की गुनगुनी धुप उसे बहुत सुहाती थी .. लेकिन ठंडी रातों में वो अक्सर अपनी माँ से चिपकी रहती थी ... उसका वो जोर जोर से रोना शायद यही एक मात्र अभिव्यक्ति वो तब जानती थी .. फिर मुझे ठीक  से याद है कुछ महीनो की होने के बाद उसका वो मुस्कुराना,  अपने हाथ बढ़ाकर घुटनों में बल चलना और फिर न जाने कैसे एक दिन किसी सहारे को पकड़ कर अचानक खड़ा हो जाना ... ओह्ह्ह कितना सुन्दर लगा था जब वो यूँ खड़ी हुई और सबकी और देख कर मुस्कुराई ..!  मुझे याद है उसका वो इशारों से बाते करना .. हर बात को इशारों में समझाना पहले पहल तो हम सभी बहुत आनंदित हुआ करते थे .. लेकिन जब वो दो-तीन साल की होकर भी नहीं बोली तो तो हम सभी कितना चिंतित  थे .... सभी उसे बुलवाने का प्रयास करते थे कितनी बाते करते थे उससे लेकिन वो थी की हर बात का जवाब देती केवल इशारों में ..! पैरों में छोटी छोटी सी सुन्दर पैजनिया, सुन्दर गौर वर्ण और बोलती सी आंखे .. घर में रौनक बिखेरे रहती थी ..

फिर अचानक एक दिन उसके मुह से वो स्वर निकला जिसका इन्तजार हम सभी कितने वर्षों से कर रहे थे और तब फिर वो कुछ ही दिनों में इतनी बाते करने लगी जैसे ना जाने कब से उसे क्या क्या कहना शेष था .. मन को स्पंदित करता था ...उसका ये बालपन ... मुझे याद है उसका वो एक छोटा सा बैग टांग कर पास के विद्यालय में जाना .. उफ़ कितनी मुश्किल पड़ता था उसे ये समझाना कि ये उसके लिए बहुत जरूरी है, कितने लालच और लोभ देते थे हम सभी ... फिर धीरे-धीरे उसका अक्षर ज्ञान .. उसकी वो लिखावटें .. उसके कागज से अधिक घर कि दीवारों पे बनाये हुए चित्र ..डांटने पे भाग कर किसी दूसरी  मौसी या मामा कि गोद में चढ़ जाना ... और उससे लिपट जाना .. आज सभी कुछ कल का सा  याद है ..! फिर याद है ... घर में उसका पालतू श्वान "सोफ्टी" के साथ खेलना .. .क्या सामजस्य था दोनों का "सोफ्टी" अक्सर उसके रबड़-पेंसिल मुह में दबा कर भाग कर छुप जाया करती थी .. केवल मैं ही था जिसके डांटने पर वो पेन्सिल -रबड़ लौटाती थी  ....  मुझे याद है कि कितना समझाने पर भी श्वान के साथ खेलना उसे कितना भाता था .. उसे अपनी चादर में ढक कर सुलाना भी ..!

बच्चियां न जाने कब अचानक बड़ी हो जाती है .. हमारी गोद से बड़ी भले ही हो जाये लेकिन हमारे हिरदय से बड़ी नहीं  हो सकती ....फिर महसूस किया कि उसके स्वभाव में गंभीरता आई है .. उसकी सोच में परिपक्वता भी ..दिन भागते रहे वो पढ़ती रही और बढती रही ..स्कूल से कालेज और कालेज से यूनिवर्सिटी तक का उसका वर्षों का सफ़र मेरे लिए सब कल की सी बाते हैं ... ज्यों- ज्यों वो बड़ी होती गई त्यों- त्यों  .. उसमे बहुत से परिवर्तन आये लेकिन हमारे लिए तो वही अरु थी जिसको गोद में खिलाया था जिसके बचपन के हम साक्षी है ... अब इन दिनों में कभी कभी दीदी के जाते तो दीदी जान बूझ कर उससे चाय बनवाती थी .. कभी आखिर का गुथा हुआ आटा छोड़ कर कुछ फुल्के सिकवती थी ....

अभी कुछ महीने पहले दीदी ने खबर भेजी कि अरु की सगाई तय कर दी गई है ...सुन कर बहुत ख़ुशी हुई .. लेकिन तब भी ऐसा ना लगा कि अब वो पराई होने जा रही है ... वो तो अब तक ना केवल अपने घर की वरन अपने ननिहाल में भी रौनक थी .. उसका बचपन  में चहकना  और बड़ी होकर गंभीर हो जाना हमारे लिए कोई विशेष अंतर नहीं डालता था .... फिर वो दिन भी आ गया जब कल उसका विवाह हुआ .. मैंने देखा सप्तपदी संस्कार में दीदी लगातार अपने आंसू पौंछ रही थी .. जीजा सा के चेहरे पर एक गंभीर मुस्कान थी ...सभी अपने काम में व्यस्त थे .. लेकिन अरु हर पल अब पराई हो रही थी ...लगता था जैसे कलेजे का टुकड़ा कहीं किसी को सौंपा जा रहा हो ... हजारों  लोगो ने विवाह में शिरकत की .. खूब नाच गाना, मिठाइयाँ, जेवर, नए  नए कपडे ... घर के भीतर बहार सजावटे ... लेकिन अग्नि को साक्षी करके उसका हाथ अब घर के बड़ों ने एक ऐसे जीवनसाथी के हाथ में दे दिया था जिसकी इच्छा ही अब अरु की इच्छा है .... उसने कितनी सहजता से इसे स्वीकार भी कर लिया, आज से वो उसके दीर्घ जीवन और उसके परिवार की खुशियों के लिए व्रत-पूजा किया करेगी ... उपनाम से लेकर परिवार का गोत्र तक सब बदल गया उसका .... हम सभी परिजन, मित्र, कहीं पीछे छूट  गए ....कल तक हमसे पूछ कर घर से बाहर कदम रखने  वाली  ने अब से अपने आपको सहर्ष  एक अनजान परिवार की इच्छाओं  के अधीन कर लिया ...वो सभी रीति रिवाज, खान पान तक बदल लेगी जो अब  तक 25 वर्षों में उसने अपने घर और ननिहाल में सीखे थे ... उस परिवार की इच्छा अनुसार खाएगी और तदानुसार व्यवहार भी सीखेगी ...हमारे घर आने के लिए अब से उसे हमारे निमंत्रण और उनकी आज्ञा भी लेनी होगी ... अपने पसंदीदा परिधान वो अब मायके में छोड़ गई है ... वो भी अब कहीं और एक बार फिर से तय होंगे ... जिन उँगलियों को पकड़ कर उसे चलना सिखाया था उन पर मेहँदी रचने से इतना बड़ा अंतर आ जायेगा  कल से पहले मुझे  ऐसा कभी महसूस नहीं हुआ था .....

कल विवाह मंडप में कभी मै  अरु को देखा था तो कभी अपनी दस वर्ष की लाडली अनंता को .. जो कब दस वर्ष  की हो गई मुझे तो पता भी नहीं चला ... एक दिन वो भी पराई हो जाएगी ... फिर ना जाने उसके लिए  कैसा घर होगा ... मुझे याद आया मेरे बाबा साहब अक्सर कहा करते थे ... "बेटियों को मत डाटो ... खूब लाड करो, इन्हें अच्छे संस्कार  दो ... इनके लाड-चाव करो .. ये तो चिड़ियाए हैं एक दिन उड़ जाएगी ..." हमारी अरु कल अपना नया घर बसाने विदा हो गई ..




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